चोक्खा गोठ
अखिल पांडे
फलों के राजा आम को लेकर न केवल हमारे देश में, बल्कि दुनिया भर में यह कौतुक रहता है कि भारत का आम सबसे अलग क्यों है? 80-90 के दशक में स्कूल में हमें भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा रचित नाटक का एक अंश पढ़ाया जाता था:
याही भुव महँ होत है, हीरक आम कपास। इतही हिमगिरि गंगाजल, काव्य गीत परकास॥
यह कविता मुझे बार-बार याद आती थी। मैं सोचता था कि हीरा और कपास केवल भारत में बहुतायत में होते हैं, यह तो ठीक है; लेकिन क्या आम भी केवल भारत में ही होता है? यह बात समझ में नहीं आती थी। बालपन में विचार आता था कि अगर आम का पौधा किसी दूसरे देश पहुँच जाए तो वहाँ भी फल सकता है। बाद में समझ आया कि आम बहुत से देशों में होता है, लेकिन भारत के आम की बात ही कुछ खास है। वैसे ये बातें तो अधिकांश लोग जानते हैं, फिर आम पर मेरे लिखने का क्या कारण है? अब इस बात पर आता हूँ।दरअसल, आम ने मेरा मनोविश्व (सोच-विचार) ही बदल दिया है। यानी स्वाद के प्रति मेरी सोच और समझ पूरी तरह बदल चुकी है। कुछ वर्षों पहले तक मेरी सोच थी कि खट्टे और मीठे को मिलाकर खाना गर्म प्रदेशों में पसंद नहीं किया जाता। यानी ‘खट्-मधु’ स्वाद उत्तर भारतीय लोगों को अधिक पसंद आता है, जबकि छत्तीसगढ़ में या तो आप खट्टा खा लो या फिर मीठा। यहाँ का ऐसा कोई पकवान मुझे याद नहीं आता जो खट्-मधु हो। गाँव से लेकर शहर तक रहने के दौरान खट्-मधु खाने की चीजें न तो घर में मिलीं और न ही रिश्तेदारों के यहाँ। और कहीं मिल भी जाएँ, तो मुझे पसंद नहीं आती थीं। हालांकि, मैं बहुत अधिक खट्टी चीजें भी नहीं खा पाता, दाँत खट्टे हो जाते हैं।
आम के प्रति मेरी शुरुआती धारणा ऐसी बनी क्योंकि बचपन में केवल ‘तोतापरी'(कलमी) आम देखने को मिलता था, जो काफी खट्टा होता है। इसे मैं बिल्कुल नहीं खा पाता था, बस यूँ कहें कि थोड़ा चाट भर लेता था। देसी पके आम भी अपने खट्-मधु स्वाद के कारण मुझे पसंद नहीं आते थे। घर में हम तीन भाई बड़े हैं। बचपन में खाने की चीजों को लेकर हम तीनों के बीच थोड़ी खींचतान चलती रहती थी, लेकिन यह आम ही था जो मुझे इस मुकाबले से बाहर कर देता था। यानी बड़े भाई को आम की गुठली (बीज) वाला हिस्सा चाहिए होता था और दूसरे को बाकी का हिस्सा, लेकिन मैं इस टंटे में 12वाँ खिलाड़ी था। बाकी सभी खाने-पीने की चीजों में मेरी ओपनिंग एंट्री होती थी!
25-30 साल की उम्र तक मैं आम के बारे में बस यही जानता था कि आम का मतलब खट्-मधु स्वाद, जो मुझे ज़रा भी पसंद नहीं था। स्थिति यह थी कि चाट हो या कुछ और, खट्टे के साथ मीठे का घालमेल मुझे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होता था। ऊपर से अगर किसी होटल में कोई मुझसे पूछ ले कि “मीठी चटनी डालूँ क्या?”, तो मुझे बड़ा अजीब लगता कि भला चटनी भी मीठी हो सकती है? चटनी है तो तीखी या खट्टी होगी, पर मीठी है तो फिर चटनी कैसी?
एक बार रितु (गाँव के रिश्ते में भाई) ने ‘दशहरी’ आम का ऐसा महिमामंडन शुरू किया कि खत्म होने का नाम ही न ले। यह नाम मेरे लिए नया था, क्योंकि तोतापरी के अलावा मैं सिर्फ देसी आम ही जानता था। न कभी आम की गली में जाना हुआ और न किसी के परोसने पर उसे मुँह से लगाया। उस समय मैंने दशहरी का स्वाद लिया; स्वाद अलग तो था, पर पसंद नहीं आया।
कुछ साल बीते, तो दशहरी आम अच्छा लगने लगा। फिर बाज़ार में मिलने वाले तमाम आमों को टेस्ट करने लगा। धीरे-धीरे आम के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा। लगने लगा कि आम का सीज़न आए तो कुछ नया टेस्ट किया जाए। रायपुर और बिलासपुर में उपलब्ध अच्छी किस्मों के लगभग सभी आम मैंने चख डाले। अब केसर, दशहरी और चौसा जैसे आम मुझे ऐसे लगने लगे मानों ये महिलाओं की पसंद हों। जैसे महिलाओं को वोदका या बीयर पसंद हो, या फिर नए पीने वाले केवल बीयर पीते हों, या सिगरेट में माइल्ड फ्लेवर केवल नौसिखिए पीते हों! मैं तो ‘ब्रिस्टल’ और ‘विल्स’ के बीच ‘क्लासिक’ की तलाश में था। क्योंकि ज़माना हाइब्रिड का है। चाहे सब्जी हो या फल, हाइब्रिड ने स्वाद का पूरा कबाड़ा कर दिया है। अस्सी-नब्बे के दशक में जो स्वाद फलों और सब्जियों में होता था, वह अब कहाँ?
एक बार रितु से फिर आम को लेकर बात निकली तो वह अब भी दशहरी आम पर ही अटका हुआ था। मैंने उससे कहा कि पहली बार इस साल मैंने काफी आम खाए हैं। उसने कहा कि इस सीज़न में वह अब तक दो-तीन क्विंटल आम खरीद चुका होगा! अब इसके आगे उससे कुछ कहना ही बेकार था।
हमारे गाँव में एक चाचा हैं। उनका उदाहरण देना कुछ ऐसा है कि घर में अगर किसी सब्जी की बात निकले, तो उसकी ऊँचाई पोरिस भर (बाँस की ऊँचाई जितना) और उसे तोड़ने के लिए कुल्हाड़ी की ज़रूरत पड़ जाए! गाँव की बात ही कुछ और होती है।
वैसे, गाँव से शहर आए हम लोगों के भीतर का ‘गंवारपन’ आज भी जिंदा है, बस उसे सही तरह से कुरेदने की आवश्यकता है। वास्तव में यही हमारी पूँजी है। लेकिन इस निश्छलता का फायदा कोई और उठा ले जाता है। जैसे मैं आम के बारे में सोच रहा हूँ—साफगोई से बिना लाग-लपेट के तथ्यों को रखना एक बात है, लेकिन दूसरी ओर अपनी मासूमियत उजागर करना भी है। देखने वाली बात होगी कि तथ्यों का पलड़ा कितना भारी पड़ता है, वरना मासूम तो हज़ारों मिल जाते हैं।
बहरहाल, मैं जिस ‘क्लासिक’ आम की बात कर रहा था—एक बार ‘अल्फांसो’ का स्वाद लिया तो दाँत खट्टे हो गए। मैंने सोचा कि अल्फांसो का अपना एक ब्रांड है, लेकिन इसमें अन्य आमों की तुलना में खट्टापन ज़्यादा है। पर सोचता हूँ कि आम है तो थोड़ा खट्टा तो होगा ही, अगर पूरा मीठा ही हो गया तो फिर आम किस बात का? इसी हिसाब से मैंने सही खट्-मधु आम की खोज जारी रखी। पिछले तीन सालों से मुझे ‘लंगड़ा’ आम में खट्टे और मीठे का जो संतुलन मिला, वह किसी अन्य आम में नहीं मिला। छोटा बीज (गुठली) और ज़्यादा गूदेदार होने के कारण लंगड़ा आम बेस्ट है। लेकिन इसमें भी स्थानीय या बिहार के लंगड़ा आम का स्वाद बिल्कुल अलग होता है, जबकि बनारस के लंगड़ा आम का स्वाद सबसे अनूठा है। यही कारण है कि इस आम को GI टैग (स्थानीय पहचान) का तमगा मिला है।लंगड़ा आम के नाम के पीछे की कहानी बताई जाती है कि किसी मंदिर के बगीचे में एक साधु ने आम के दो पौधे लगाए थे। उनकी देखभाल एक लंगड़ा व्यक्ति बड़े ध्यान से करता था। जब फल आए, तो लोग उन्हें तोड़ने की कोशिश करते थे, लेकिन वह लंगड़ा व्यक्ति बड़ा सजग रहता था। धीरे-धीरे इस आम की माँग बढ़ी और लोग इसे ‘लंगड़ा आम’ कहकर पुकारने लगे। गूगल के अनुसार, लंगड़ा आम लगभग ढाई से तीन सौ साल पुरानी किस्म है।लंगड़ा आम ने मेरी पूरी मनोदशा ही बदल दी है। अब मैं खट्टी चटनी के साथ मीठी चटनी भी खा लेता हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या आम के सीज़न में कभी लंगड़ा आम के बगीचे में जाकर सीधे पेड़ से पका हुआ ताजा आम खा पाऊँगा? और अगर खाया, तो उस आम का स्वाद कैसा होगा?
जय राम जी की!


