दिल्लीआम तौर पर जब युद्ध चल रहा होता है तो बड़े निवेशक शेयर बाजार से पैसे निकाल कर सोने में लगाने लगते हैं. यही वजह है कि हर बड़े संकट के दौरान सोने की कीमतें बढ़ती हुई दिखाई देती हैं. लेकिन इस बार तस्वीर थोड़ी अलग है. मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव फिर बढ़ गया है. होर्मुज जैसे दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्ते पर तनाव भी गहरा गया है. कच्चे तेल की कीमतें भी चढ़ रही हैं. दुनिया में महंगाई बढ़ने की आशंका भी तेज हो गई है. यानी अनिश्चितता बेहद बढ़ गई हैं. इन सभी विकट परिस्थितियों के बावजूद सोने की कीमतें नीचे आ रही हैं. आखिर सोने की कीमतें कम क्यों हो रही हैं?
इसका जवाब केवल इस युद्ध में नहीं है बल्कि अमेरिका की फेडरल रिजर्व यानी अमेरिकी केंद्रीय बैंक की नीतियों में छिपा है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि ईरान के साथ युद्ध खत्म करने के लिए हुआ अंतरिम समझौता अब खत्म हो चुका है. इसके कुछ ही घंटों बाद अमेरिकी सेना ने कहा कि उसने ईरान के खिलाफ नए हमले शुरू किए हैं, ताकि होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित न हो. इन घटनाओं के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ गई. बाजार को डर है कि अगर तनाव और बढ़ा तो तेल की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है.यही सबसे बड़ा सवाल है. सोना हमेशा सेफ हेवन के तौर पर देखा जाता है, यानी इसे सबसे सुरक्षित निवेश माना जाता है. जब दुनिया में संकट आता है तो निवेशक सोने की ओर भागते हैं. लेकिन इस बार बाजार सिर्फ युद्ध नहीं देख रहा, बल्कि उसके आर्थिक असर को भी समझ रहा है. अगर तेल महंगा होगा तो दुनियाभर में महंगाई बढ़ेगी. अगर महंगाई बढ़ेगी तो अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रख सकता है या जरूरत पड़ने पर फिर बढ़ा भी सकता है. यहीं से सोने पर दबाव शुरू हो जाता है.तेल महंगा होने का मतलब सिर्फ पेट्रोल और डीजल महंगा होना नहीं है. इसका असर ट्रांसपोर्ट, हवाई यात्रा, फैक्ट्री, बिजली, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा के सामान तक पहुंचता है. यानी अगर तेल लगातार महंगा रहता है तो पूरी दुनिया में महंगाई बढ़ सकती है. इसी डर ने निवेशकों की सोच बदल दी है.अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी IMF ने 2026 के लिए वैश्विक आर्थिक विकास का अनुमान घटाकर 3 फीसद कर दिया है. इसका मतलब है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था के आगे बढ़ने की गति पहले की उम्मीद से मंद पर सकती है. एक तरफ जंग का खतरा है, तो दूसरी तरफ महंगाई का दबाव और तीसरी ओर धीमी होती वैश्विक अर्थव्यवस्था. यानी बाजार एक साथ कई चुनौतियों का सामना कर रहा है.भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में शामिल है. अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहता है, तो इसका असर भारतीय बाजार में भी दिखाई देगा. साथ ही अगर तेल महंगा होता है तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है. इससे महंगाई बढ़ने का खतरा भी रहेगा. यानी मिडिल ईस्ट की जंग का असर सिर्फ युद्ध वाले देशों तक सीमित नहीं है. इसकी गूंज भारत के सर्राफा बाजार से लेकर आम आदमी की जेब तक सुनाई दे सकती है.
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