आखिरी कमांडर का सरेंडर: शांति अब स्थायी कैसे हो

आखिरी कमांडर का सरेंडर: शांति अब स्थायी कैसे हो

रायपुर

कालम – गोंदली के फोकला

अखिल पांडे

नक्सलवाद — भारत की स्वतंत्रता के बाद का सबसे लंबा सशस्त्र विद्रोह — अब करीब-करीब खत्म माना जा सकता है। कम से कम पापा राव जैसे आखिरी बड़े कमांडर के आत्मसमर्पण के बाद नक्सलियों का कोई संगठित बड़ा ढांचा नहीं बचा है। अब संगठित रूप से कोई बड़ी घटना को अंजाम देना उनके लिए आसान नहीं रहा। इसलिए कह सकते हैं कि नक्सली समस्या अगर पूरी तरह खत्म नहीं भी हुई है, तो निष्प्रभावी जरूर हो गई है।

1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से शुरू हुई यह हिंसा दशकों तक मध्य भारत के आदिवासी इलाकों में छाई रही। लेकिन छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार बनने और केंद्र में 2024 में अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद नक्सलियों के खिलाफ एक बड़ी और सुनियोजित रणनीति शुरू हुई। पिछले दो वर्षों की दृढ़ इच्छाशक्ति और निरंतर प्रयास की यह विजय है।

2023 में, जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार थी, पूरे वर्ष केवल 20 नक्सली मारे गए थे। वहीं 2024 में यह संख्या अढ़ाई सौ के करीब पहुंच गई। इससे साफ समझ आता है कि अमित शाह पिछले पांच वर्षों से छत्तीसगढ़ आते रहे, लेकिन जब तक राज्य में भाजपा सरकार नहीं बनी और केंद्र में भी उनकी पार्टी की सरकार नहीं बनी, तब तक नक्सलियों के खिलाफ कोई बड़ी और निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई।
सूत्रों के अनुसार अमित शाह ने बकायदा इंटरव्यू लेकर प्रदेश के लिए गृह मंत्री का चयन किया था। शायद पहले से वे संकल्पित थे कि नक्सलियों के खिलाफ विशेष कार्य योजना पर काम करना है, जिसके लिए उपयुक्त व्यक्ति (प्रदेश के लिए उपयुक्त गृह मंत्री) की आवश्यकता होगी।

सितंबर 2025 में गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली में पहली बार स्पष्ट रूप से प्रधानमंत्री के फैसले की घोषणा करते हुए कहा कि 31 मार्च 2026 तक नक्सल समस्या को जड़ से खत्म कर दिया जाएगा। और आज, ठीक एक सप्ताह पहले आखिरी बड़े कमांडर पापा राव के आत्मसमर्पण से अमित शाह की इच्छाशक्ति, सुरक्षाबलों के भारी संघर्ष और बलिदान की बदौलत बस्तर में एक नई सुबह दिख रही है।

नक्सल समस्या के खात्मे के बाद श्रेय लेने की कई कहानियां सामने आ सकती हैं। कई स्वर उठेंगे जो इस सफलता की दिशा अपने हिसाब से तय करने की कोशिश करेंगे। लेकिन जिन लोगों ने पिछले कई वर्षों से बारीकी से नजर रखी है, वे जानते हैं कि इसके पीछे बहुत लंबी तैयारी और कई ताकतें जुड़ी हुई थीं। इसे अचानक नहीं खत्म किया जा सकता था।

जो झोला-छाप एनजीओ बिरादरी एक छोटी-सी नक्सली मुठभेड़ के बाद रायपुर में शोर मचाने लगती थी, वे छत्तीसगढ़ आने से क्यों कतराते थे और रायपुर के बजाय हैदराबाद में मीटिंग क्यों करते थे — यह भी समझने वाली बात है। इसलिए नक्सल समस्या का उन्मूलन किसी एक वजह से नहीं, बल्कि समग्र प्रयास और दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम है।

इसमें केंद्रीय सुरक्षा बलों, छत्तीसगढ़ पुलिस और डीआरजी के जवानों की मेहनत और बलिदान के साथ-साथ इसे लीड करने वाले अधिकारियों और प्रदेश के गृह मंत्री विजय शर्मा की दो वर्षों की नक्सल-केंद्रित मेहनत भी शामिल है।

नक्सलियों में बढ़ते मतभेद

लगातार सुरक्षाबलों द्वारा नक्सलियों पर शिकंजा कसते जाने और नक्सल प्रभावित इलाकों में कैम्प बढ़ते जाने से स्थानीय लोगों में विश्वास लौटा और नक्सलियों का आत्मबल टूटता गया। साथ ही नक्सली लीडरों के बीच आपसी फूट भी लगातार बढ़ रही थी। सेंट्रल कमेटी में यह चर्चा हो रही थी कि हथियार उठाकर विद्रोह करने से सफलता नहीं मिल रही। नक्सली भर्ती में हर साल औसतन 33 प्रतिशत लोग वापस लौट जाते थे और यह संख्या पिछले कुछ वर्षों में और बढ़ गई थी।

सुरक्षा बलों के खिलाफ कार्रवाई करना भी उनके लिए अब आसान नहीं रह गया था। बताया जाता है कि 16 जनवरी 2024 को नक्सलियों की एक बड़ी बैठक में सशस्त्र क्रांति को लेकर गहन चर्चा हुई। तेलुगु लीडरों को लेकर संगठन में आक्रोश बढ़ रहा था। इसके बाद मड़क हिडमा को सेंट्रल कमेटी में शामिल किया गया, जो पहला स्थानीय आदिवासी था। इससे पहले सेंट्रल कमांड में तेलुगु ब्राह्मणों का दबदबा था।

इस फूट के बाद सुरक्षा बलों की नई रणनीति और भूपति उर्फ वेढ़ुगोपल के गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) में आत्मसमर्पण ने नक्सलियों के बीच मतभेद और उजागर कर दिए। इसका सीधा फायदा सुरक्षाबलों को मिला।

डीआरजी जवानों की अहम भूमिका

बस्तर के डीआरजी यानी डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड की भूमिका इस अभियान में बेहद महत्वपूर्ण रही। ये वे जवान हैं जो कभी खुद नक्सली हुआ करते थे, लेकिन आत्मसमर्पण के बाद उन्हें डीआरजी में नियुक्ति मिली। बस्तर के हर चप्पे की जानकारी रखने वाले इन जवानों के सहयोग से सुरक्षाबलों को नक्सलियों को घेरना आसान हो गया। नक्सली अब एम्बुश में फंसने लगे। न केवल उनकी बड़ी संख्या में मौतें हो रही थीं, बल्कि उनकी रणनीतियां भी डीआरजी जवानों तक पहुंच रही थीं। लोकल आदिवासी नक्सलियों को तोड़ने में डीआरजी ने बड़ी भूमिका निभाई।

शांति वार्ता का प्रस्ताव न मानना — एक बड़ी जीत

शांति वार्ता का प्रस्ताव मानने से इनकार करना भी सरकार की एक बड़ी रणनीतिक जीत साबित हुआ। यह प्रस्ताव मुख्य रूप से अर्बन नक्सलियों और एनजीओ बिरादरी के माध्यम से सरकार तक पहुंच रहा था। सरकार ने साफ कह दिया कि शांति वार्ता के लिए सीधे नक्सलियों से बात होगी, किसी तीसरी पार्टी के माध्यम से नहीं। इससे इंटेलिजेंस एजेंसियों को नक्सलियों से सीधी बातचीत करने का मौका मिला और आत्मसमर्पण की रूपरेखा तैयार हुई।

नक्सलियों की कमजोर होती स्थिति के बाद अब नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे के लिए बड़ी संख्या में लोग मैदान में कूद पड़े हैं। आज बस्तर एक नई सुबह की ओर बढ़ रहा है।

आगे की चुनौतियां

हालांकि चुनौतियां अभी भी कम नहीं हैं। कुछ नक्सली हथियार डंप करने की बात कर रहे हैं, लेकिन कभी भी फिर सक्रिय हो सकते हैं। जो छोटे-छोटे समूह (15-20 की संख्या में) अलग-अलग जगहों पर सक्रिय हैं, वे व्यक्तिगत कारणों से हथियार नहीं डाल रहे — किसी में बदले की भावना है, तो किसी की अन्य मांगें हैं। सुरक्षाबल उनसे लगातार संपर्क कर आत्मसमर्पण के लिए प्रयास कर रहे हैं।

सबसे बड़ी समस्या अर्बन नक्सलियों की है, जो बाहर से नक्सलियों को सपोर्ट करते रहे हैं। उनके लिए क्या रणनीति अपनाई जाए, यह देखने वाली बात होगी।

आने वाले दिनों में सरेंडर करने वाले नक्सलियों का स्थानीय स्तर पर पुनर्वास कर उन्हें मुख्यधारा में लाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। सरकारी योजनाओं को आदिवासियों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना और जमीनी स्तर पर उन्हें फलीभूत करना जरूरी है। सुरक्षा बलों की उपस्थिति अभी भी अत्यंत आवश्यक है, ताकि आम लोगों में सुरक्षा को लेकर पूर्ण विश्वास बना रहे। साथ ही सीमावर्ती राज्यों से नक्सलवाद के किसी भी संभावित खतरे से निपटने की भी तैयारी रखनी होगी।

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