“फुटकल” की पत्तियों में कैल्शियम, आयरन, फाइबर और जिंक भरपूर मात्रा में पाई जाती है।

“फुटकल” की पत्तियों में कैल्शियम, आयरन, फाइबर और जिंक भरपूर मात्रा में पाई जाती है।

औषधीय तत्वों का है खजाना

बिलासपुर चटनी,आचार, ग्रेवी या फिर बनाईये सब्जी, उन पत्तियों से जिसे “फुटकल” के नाम से जाना जाता है। इतना ही नहीं इसकी कोंपल से माड़ भी बनाई जा सकती है। झारखंड में सर्वाधिक पसंद की जाने वाली ‘फुटकल’ को तलाश है उस माध्यम की, जिसकी सहायता से छत्तीसगढ़ के सब्जी बाजार में पहुंचा जा सकता है।

वानिकी वैज्ञानिकों के बीच फिकस जेनीकुलाटा के नाम से पहचाने जाने वाले इस वृक्ष को झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में ‘फुटकल’ के नाम से पहचान मिली है। हरी सब्जियों के संकट के इस मौसम में फुटकल बड़ा सहारा बना हुआ है क्योंकि यह मौसम, इसके लिए बेहतर समय होता है। लिहाजा आदिवासी क्षेत्र के साथ शहरी उपभोक्ता बाजार में भी मांग बढ़ी हुई है। बहुपयोगी और विविध व्यंजन के गुणों की वजह से अपने छत्तीसगढ़ में भी फुटकल रास्ता देख रहा है मांग की।

कोंपल और पत्तियों से

फिकस जेनिकुलाटा याने फुटकल की पत्तियां उस समय सेवन के योग्य होती हैं, जब इसका स्वरूप कोंपल या नाजुक होता है। बाद की अवधि में इन्हें सुखाकर संरक्षित रखने के बाद पूरे साल सब्जी या व्यंजन की तरह सेवन किया जा सकता है। इसलिए फुटकल की पत्तियों का उपयोग कच्ची और सूखी, दोनों अवस्था में किया जा सकता है।

बनती हैं यह खाद्य सामग्री

फुटकल की कोंपल या पत्तियों से अचार, चटनी, व्यंजन तो बनते ही हैं, साथ ही सब्जियां भी बनाई जाती है। दिलचस्प यह कि इससे माड़ भी बनाया जा सकता है। सुखाकर रखने के बाद पूरे साल इसे ग्रेवी या सूखी सब्जी के रूप में भी सेवन किए जाने का प्रचलन झारखंड के आदिवासी क्षेत्र में है।

मेडिशनल प्रॉपर्टीज

अनुसंधान में फुटकल की कोंपल और पत्तियों में कैल्शियम, आयरन, फाइबर और जिंक की भरपूर मात्रा की उपलब्धता की जानकारी मिली है। इन्हीं औषधीय गुणों की वजह से हड्डी और दांतों को यह मजबूत रखता है। नियमित सेवन से रक्त कण बढ़ते हैं। पेट दर्द से राहत दिलाने के अलावा उल्टी और दस्त रोकने में भी इसे सक्षम पाया गया है।

प्रकृति का उपहार

प्रकृति ने वनस्पतियों के रूप में हमें कई अमूल्य उपहार दिए हैं। औषधीय गुणों से भरपूर पिलकन की नवीन कोंपल जिसे फुटकल के नाम से झारखंड के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में निवासरत जनजाति के लोग सब्जी, चटनी एवं अचार के रूप में भोजन में शामिल कर अपनी पोषण आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। छत्तीसगढ़ में इसके लिए बेहतर संभावनाएं हैं।

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