सुभाष चंद्रा 22 हजार करोड़ बनाम ₹6.5 करोड़ का मामला, कल होगी सुनवाई
नई दिल्ली। जी ग्रुप के संस्थापक और एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही में 31 अगस्त 2026 को बड़ा कानूनी मोड़ आ गया। जिस मामले में 25 अगस्त को NCLT के तीसरे सदस्य ने करीब ₹22,006.57 करोड़ के दावों के मुकाबले लगभग ₹6.5 करोड़ के भुगतान वाले रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दी थी, उस पर अब अंतिम आदेश की स्थिति ही स्पष्ट नहीं रह गई है।
NCLT की ओर से 31 अगस्त को जारी आदेश के मुताबिक, मामले में सदस्यों के बीच बहुमत की राय नहीं बन सकी। इसी वजह से मामला दोबारा NCLT के अध्यक्ष के पास भेजा गया है। अध्यक्ष ने अब पांच सदस्यीय विशेष बेंच गठित की है, जो इस मामले पर आगे सुनवाई करेगी। तस्वीर में मौजूद आधिकारिक आदेश के अनुसार विशेष बेंच 1 सितंबर 2026 को सुबह 10:15 बजे बैठेगी।
आखिर हुआ क्या?
मामला Indiabulls Housing Finance Limited बनाम डॉ. सुभाष चंद्रा से जुड़ा है। यह मामला सुभाष चंद्रा की Personal Guarantor Insolvency Proceedings से संबंधित है। NCLT के रिकॉर्ड में यह मामला C.P. (IB) No. 97/ND/2022 के रूप में दर्ज है।
Insolvency and Bankruptcy Board +1
25 अगस्त को NCLT के तीसरे सदस्य ने सुभाष चंद्रा के रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दी थी। इसमें करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted creditor claims के मुकाबले लगभग ₹6.5 करोड़ का भुगतान प्रस्तावित था। इस फैसले को लेकर बैंक और अन्य वित्तीय संस्थानों की ओर से गंभीर आपत्तियां सामने आई थीं।
मामले की खास बात यह है कि ₹22,006.57 करोड़ की राशि को सीधे तौर पर सुभाष चंद्रा का व्यक्तिगत बैंक लोन समझना सही नहीं होगा। कार्यवाही उनके द्वारा विभिन्न कंपनियों को दिए गए personal guarantees से जुड़ी है। सुभाष चंद्रा की ओर से भी कहा गया है कि वे मूल कर्जदार नहीं बल्कि गारंटर थे।
अब 6.5 करोड़ वाला फैसला क्यों अटक गया?
31 अगस्त के ताजा घटनाक्रम में असली मुद्दा यही है।
मूल दो सदस्यीय बेंच में अलग-अलग राय सामने आई थी। इसके बाद मामले को तीसरे सदस्य के पास भेजा गया था। तीसरे सदस्य ने अपना स्वतंत्र फैसला दिया और ₹6.5 करोड़ के रिपेमेंट प्लान को मंजूरी दी।
लेकिन सोमवार को मूल बेंच के सामने जब मामला वापस आया तो तीसरे सदस्य की राय को दोनों मूल सदस्यों की राय के साथ जोड़कर कोई स्पष्ट बहुमत नहीं बन सका।
PTI के मुताबिक, बेंच ने माना कि तीसरे सदस्य ने स्वतंत्र आदेश दिया है और इसलिए “no majority view emerges” यानी बहुमत की कोई स्पष्ट राय नहीं बन पाई। इसी वजह से इस स्तर पर अंतिम आदेश पारित नहीं किया जा सका और मामला फिर NCLT अध्यक्ष के पास भेजना पड़ा।
पांच सदस्यीय बेंच में कौन-कौन?
31 अगस्त के आदेश में NCLT अध्यक्ष ने पांच सदस्यीय बेंच गठित की है। इसमें शामिल हैं—
NCLT के माननीय अध्यक्ष
श्री बच्चू वेंकट बालाराम दास, सदस्य (Judicial)
श्री महेंद्र खंडेलवाल, सदस्य (Judicial)
श्री अतुल चतुर्वेदी, सदस्य (Technical)
श्री रविंद्र चतुर्वेदी, सदस्य (Technical)
आदेश में साफ कहा गया है कि इस बेंच का गठन Companies Act, 2013 की Section 419(5) के तहत किया गया है।
अब 1 सितंबर को क्या होगा?
NCLT के आदेश के मुताबिक नई विशेष बेंच 1 सितंबर 2026 को सुबह 10:15 बजे मामले की सुनवाई करेगी।
इस सुनवाई के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि ₹6.5 करोड़ वाले रिपेमेंट प्लान को अंतिम रूप मिलता है या मामले में कोई अलग कानूनी निष्कर्ष निकलता है।
यानी सोशल मीडिया में चल रही यह बात कि “NCLT ने ₹22 हजार करोड़ के बदले ₹6.5 करोड़ का फाइनल ऑर्डर दे दिया”, अब सावधानी से लिखने वाली बात है। उपलब्ध 31 अगस्त के आदेश और ताजा रिपोर्टिंग के अनुसार, इस समय उस मामले में अंतिम आदेश की स्थिति विवादित/अपूर्ण है क्योंकि बहुमत की राय नहीं बन सकी है।
₹22 हजार करोड़ की पूरी कहानी भी समझिए
यह मामला इसलिए सुर्खियों में आया क्योंकि 25 अगस्त के आदेश में करीब ₹22,006.57 करोड़ के admitted claims के सामने करीब ₹6.5 करोड़ का भुगतान सामने आया था। इससे लगभग 99.97% का haircut दिखाई देता है। हालांकि विशेषज्ञ रिपोर्टों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इसे सीधे-सीधे “₹22 हजार करोड़ का कर्ज माफ” कहना सही नहीं है। मामला मुख्य रूप से personal guarantor की insolvency liability से जुड़ा है, जबकि मूल कर्जदार कंपनियों की देनदारियां और उनके खिलाफ उपलब्ध recovery mechanisms अलग विषय हैं।
इस फैसले का विरोध करने वाले कुछ ऋणदाताओं ने इतनी कम recovery पर सवाल उठाए हैं। HDFC Bank और LIC Housing Finance समेत कुछ creditors ने इस मामले को चुनौती देने की तैयारी की है।
अब गेंद एक बार फिर NCLT के पाले में है। 31 अगस्त के ताजा आदेश ने 25 अगस्त के ₹6.5 करोड़ वाले घटनाक्रम को एक नए कानूनी मोड़ पर पहुंचा दिया है। 1 सितंबर की पांच सदस्यीय विशेष बेंच की सुनवाई यह तय करने में अहम होगी कि इस मामले में आगे कौन-सा रास्ता अपनाया जाएगा
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