**कवर्धा (कबीरधाम) की ऐतिहासिक खप्पर निकालने की परंपरा
छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के मुख्यालय कवर्धा में नवरात्रि की महाअष्टमी की मध्यरात्रि को एक अनोखी और सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा निभाई जाती है—**खप्पर निकालना**। यह परंपरा पूरे भारत में लगभग अद्वितीय मानी जाती है। पहले कोलकाता और दंतेवाड़ा में भी कुछ हद तक प्रचलित थी, लेकिन आज यह मुख्य रूप से कवर्धा में ही जीवित है।
### परंपरा का स्वरूप और प्रक्रिया
नवरात्रि (चैत्र या शारदीय) की अष्टमी की रात लगभग 10:30 बजे से मंदिरों के पंडों द्वारा विशेष अनुष्ठान शुरू होता है। परंपरा के अनुसार 7 काल, 182 देवी-देवताओं और 151 वीर बैतालों को मंत्रोच्चारण के साथ आमंत्रित किया जाता है। उन्हें अग्नि से प्रज्ज्वलित मिट्टी के पात्र (खप्पर) में विराजमान कराया जाता है। इसके बाद 108 नींबू काटकर रस्में पूरी की जाती हैं।
मध्यरात्रि ठीक 12 बजे के आसपास देवी शक्ति का आह्वान होता है। पंडा या सेवा करने वाला व्यक्ति सकरी नदी के घाट पर स्नान करके आदिशक्ति देवी की मूर्ति का श्रृंगार करवाता है। फिर एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में जलता हुआ खप्पर लेकर नगर भ्रमण शुरू होता है।
कवर्धा के तीन प्रमुख मंदिरों से खप्पर निकाले जाते हैं:
– माँ दंतेश्वरी मंदिर (सबसे पहले, लगभग 12:15 बजे)
– माँ चंडी मंदिर (लगभग 10 मिनट बाद)
– माँ परमेश्वरी मंदिर (उसके बाद)
ये खप्पर शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरते हुए लगभग 18 स्थानीय मंदिरों के सामने से निकलते हैं। पहले के दिनों में यह स्वरूप अत्यंत रौद्र माना जाता था—किलकारियों की गूंज से लोग घरों में छिप जाते थे और दरवाजे-खिड़कियों से झांकना भी साहस का काम समझा जाता था। आज यह श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक बन गया है। हजारों श्रद्धालु दूर-दूर से आकर दर्शन करते हैं।
### इतिहास और मान्यता
यह परंपरा लगभग 150 वर्षों से अधिक पुरानी है (कुछ स्रोत 100+ वर्ष बताते हैं)। पुराने समय में नगर में हैजा, महामारी, अकाल और भुखमरी जैसी आपदाएँ आती थीं। मान्यता है कि अष्टमी की मध्यरात्रि को देवी माँ खप्पर रूप में नगर भ्रमण करके पूरे शहर को “बाँध” देती हैं, जिससे कोई आपदा प्रवेश नहीं कर पाती। नगर में विराजमान देवी-देवताओं का रीति-रिवाज के अनुसार मान-मनौव्वल कर “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की भावना स्थापित की जाती है।
माँ चंडी मंदिर का इतिहास लगभग 150 वर्ष पुराना बताया जाता है। 1940 के दशक में भाटापारा से आए मिठईया और इतवारी देवांगन ने यहाँ सेवा शुरू की थी। बाद में मोहल्ला समिति ने जिम्मेदारी संभाली।
### वर्तमान स्थिति और सुरक्षा
हर वर्ष प्रशासन और पुलिस व्यापक सुरक्षा व्यवस्था करती है—सेक्टर बाँटकर टीमें तैनात, सीसीटीवी, ड्रोन निगरानी, यातायात नियंत्रण और रिजर्व बल। कोविड काल में प्रतिबंधों के बावजूद परंपरा निभाई गई थी। अफवाह फैलाने या विवाद पैदा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी जाती है।
यह परंपरा कवर्धा की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग बन चुकी है। यह सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्थानीय आस्था, समुदाय की एकता और ऐतिहासिक निरंतरता का जीवंत उदाहरण है। हर वर्ष नवरात्रि में यह परंपरा नई पीढ़ी को जोड़ती हुई आगे बढ़ रही है।
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