मोदी के संतोष से हेमंता का विजय अकबर पर भारी !

मोदी के संतोष से हेमंता का विजय अकबर पर भारी !

अखिल पांडे

रायपुर-कवर्धा जिले में खांटी जमीनी नेता मोहम्मद अकबर के खिलाफ इस बार भाजपा ने चुनावी मैदान में युवा नेता विजय शर्मा को उतारा है। लेकिन इस बार हिंदुत्व का मुद्दा उभार पर है। ठीक दो दशक पहले 2003 में यही स्थिति बनी थी। लेकिन तब भाजपा की हार हो गई थी। 2003 में देश में हिंदुत्व चेहरा बनकर उभरे नरेंद्र मोदी संतोष पांडे के पक्ष में प्रचार करने आए थे। अब 20 साल हिन्दुत्व का फायरब्रांड लीडर हेमन्ता विश्वास सरमा कवर्धा पहुंचकर हलचल मचा दिया है। प्रदेश में सबसे अधिक मतों से जीतने वाले अकबर को एक बार फिर कड़ी चुनौती मिल रही है। क्योंकि संतोष पांडे के बाद अकबर के खिलाफ एक बार फिर फायर ब्रांड युवा नेता सामने है। लेकिन अकबर की खुबी भी अन्य नेताओं से अलग है।
पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का गृह जिला कवर्धा में पहली बार जातिगत समीकरण से अलग हटकर भाजपा ने प्रत्याशी बनाया है। कवर्धा से विजय शर्मा और पंडरिया से भावना बोहरा भाजपा के प्रत्याशी हैं। राज्य बनाने के बाद सभी चुनावों में जिले के दोनों सीटों से कुर्मी-तेली जातीगत समीकरण को ध्यान में रखकर प्रत्याशी बनाया जाता था। लेकिन इस बार दोनों ही सीटों पर ब्राह्मण प्रत्याशी दिया गया है। दरअसल, राज्य के अधिकांश सीटों में इस बार जिताऊ प्रत्याशी पर भरोसा किया गया है, जिसके कारण इन दोनों को प्रत्याशी बनाया गया है। लेकिन बात कवर्धा विधानसभा क्षेत्र की है, जहां पिछले चुनाव में प्रदेश भर में सबसे अधिक वोट से जीतने वाले प्रदेश के कद्दावर मंत्री मोहम्मद अकबर एक बार फिर इस सीट पर चुनाव मैदान में है। इसके बावजूद यह चुनाव अब कांटे का हो गया है। चुनावी माहौल एक बार फिर 20 साल पहले जैसा हो गया है। जब 2003 में मोहम्मद अकबर के खिलाफ विरेंद्र नगर से वर्तमान सांसद संतोष पांडेय चुनावी मैदान में उतरे थे। इस सीट पर चुनाव प्रचार करने के लिए तब देश के वर्तमान प्रधानमंत्री व तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी प्रचार करने पहुंचे थे। तब भी विरेंद्र नगर सीट पर हिंदुत्व का मुद्दा सामने आया था। हालांकि तब मोहम्मद अकबर करीब 12 हजार वोट से चुनाव जीत गए थे। उस समय भाजपा के युवा नेता संतोष पांडे की वाक शैली में ओज दिखाई देती थी, लेकिन वे तब मंडी अध्यक्ष थे और नये नवेले थे। विजय शर्मा में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं और अभी भी भाजपा में बड़े पद पर हैं। प्रदेश में भले ही हिंदुत्व का मुद्दा नहीं उभर रहा है लेकिन कवर्धा व साजा क्षेत्र में यह मुद्दा विशेष रूप से दिखाई दे रहा है। दो साल पहले कवर्धा में झंडा विवाद मामले में हिन्दू-मुस्लिम विवाद सामने आया था। इसमें विजय शर्मा अगुवा बने थे। उनकी गिरफ्तारी हुई थी। परिणामस्वरुप हिंदुत्व का मुद्दा स्वाभाविक रूप से उफान पर है। इस स्थिति में असम के मुख्यमंत्री हेमंता विश्वास सरमा ने कवर्धा पहुंचकर मोहम्मद अकबर के खिलाफ आग उगलने वाला भाषण दिया है। यह एक तरह से 2003 में नरेंद्र मोदी के कवर्धा के नजदीक विरेंद्रनगर सीट ( डी-लिमिटेशन के बाद विलोपित सीट) में पहुंचे प्रचार से तुलना होना स्वाभाविक है। हालांकि हेमंता नामांकन के दिन यहां सभा ली थी। अब प्रचार में तेजी आएगी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भी यहां प्रचार में आने की बात हो रही है। यानी अकबर को हराने के लिए भाजपा कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती। खासकर, जब पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का गृह जिला हो तो और जरूरी है कि भाजपा यहां पर अपनी साख हर हाल में बचाए। लेकिन इस सब में मोहम्मद अकबर को हलके में लेने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। जो लगातार इस जिले के दोनों सीटों में क्षेत्र बदलकर चुनाव लड़ते रहे हैं। उसे हराना आसान नहीं है। 2013 में पंडरिया विधानसभा चुनाव में अकबर मामूली अंतर से हार गए थे। बावजूद इसके वे लगातार यहां से अन्य पांच वर्षीय चुनाव में जीतकर प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। इसलिए मोहम्मद अकबर के बारे में भी सही जानकारी होना आवश्यक है।
राजनीति के अकबर हैं मोहम्मद अकबर
प्रदेश की राजनीति में अकबर को वरिष्ठ विधायक, कद्दावर मंत्री के रूप में लोग जानते हैं। लेकिन उनकी पृष्ठ भूमि को लेकर कम लोग ही परिचित हैं। ऐसा व्यक्ति जो रायपुर निवासी होकर सौ किलोमीटर दूर अपना वर्चस्व स्थापित करता हो व राजनीति का अकबर ही है। लेकिन कवर्धा में झंडा विवाद जिसका मोहम्मद अकबर से कोई लेना-देना नहीं हैं, उसकी वजह से आज अकबर कांटे के मुकाबले में फंस गए हैं। कवर्धा के प्रमुख चौराहे में झंडा लगाने के मामूली विवाद में मारपीट करने वाले स्थानीय जाहिल-काहिल लोगों ने आज अकबर को मुश्किल में डाल दिया है। नहीं तो एक खांटी जमीनी नेता जो डॉ. रमन सिंह के जिले में अपनी छाप छोड़ता है, उसे हराना आसान नहीं है। अकबर की चुनावी रणनीति सबसे अलग है। कभी वे लाईम लाईट में नहीं रहते। लेकिन विधानसभा में मंत्री व अफसरों को अपने प्रश्नों से मुश्किल में जरूर डालते हैं। अधिकारियों से काम कराने का तरीका अकबर को अच्छे से पता है। कभी वे किसी नेता व अधिकारी से उलझते नहीं और आम जनता के काम पूरा करा लेते हैं। गांव-गांव में सीधी पहुंच अकबर की है। ग्रामीणों का काम करने में अकबर का कोई मुकाबला नहीं। भाजपा सरकार के होते जो काम भाजपा नेता नहीं करा पाते थे, वह काम अकबर एक फोन से कर लेते थे। धनबल में कोई कसर नहीं रहने देने की वजह से अकबर चुनाव को कांटे के मुकाबले में तब्दील कर देते हैं। 
लेकिन इस बार मामला एक बार फिर हिंदुत्व को लेकर है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि, जिले में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है। जिसमें बाहरी मुस्लिमों का जिले में आकर बस जाना महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। जबकि 2003 में यह मुद्दा नहीं था। यही कारण है कि ग्रामीण इलाके में इस बार लोग स्वयं होकर समर्थन के साथ भाजपा प्रत्याशी विजय शर्मा को चंदा भी दे रहे हैं। नामांकन के दिन स्वस्फूर्त लोगों की भीड़ जुटी थी। हालांकि मोहम्मद अकबर के नामांकन में भीड़ की कमी नहीं थी। लेकिन फिर इस भीड़ को स्वस्फूर्त नहीं माना जा रहा है। इससे भी बड़ी बात आप पार्टी के उम्मीदवार खड्ग राज सिंह ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों में अकबर के वोट काटने का काम कर रहे हैं। इस स्थिति में अकबर की चुनावी रणनीति कौशल की परीक्षा होने वाली है।
यह विजय को बना देगा फायर ब्रांड लीडर
कवर्धा में 7 नवंबर को वोटिंग होगी। यह अकसर देखा जाता है कि पहले चरण की वोटिंग का असर दूसरे चरण में पूरी तरह से दिखता है। कवर्धा जिला में होने वाली वोटिंग का असर अगले 10 दिनों में होने वाली वोटिंग पर भी निश्चित तौर पर दिखेगा। विजय शर्मा भी जमीनी नेता हैं ,प्रदेश की राजनीति में युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। जिला पंचायत सदस्य होने के साथ-साथ विजय शर्मा वर्तमान में भाजपा के प्रदेश महामंत्री हैं। सेंट्रल इलेक्शन कमेटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में होने वाली मीटिंग में विजय शर्मा भी हिस्सा लेते हैं। इस अनुभव के कारण विजय शर्मा एक नेता के रूप में अकबर को टक्कर देने में उन्नीस साबित नहीं होने वाले हैं। लेकिन विजय शर्मा प्रभावशाली वक्ता भी हैं। आग उगलने वाला संबोधन आम लोगों के बीच हिंदुत्व नेता के रूप में उन्हें स्थापित करता है। अगर वे यह चुनाव जीत जाते हैं तो वे प्रदेश भर में फायर ब्रांड नेता के रूप में स्थापित हो जाएंगे। जबकि यही उम्मीद सांसद संतोष पांडे पर कभी लोगों को होती थी। लेकिन उनकी जमीनी पकड़ कमजोर होने के कारण उनकी वाकपटुता की धाक नहीं जम पाई। इस सबके बावजूद मोहम्मद अकबर चुनाव जीतते हैं तो यह प्रदेश की राजनीति के साथ ही राष्ट्रीय नेतृत्व की निगाह में आ जाएगा और एक सेक्युलर नेता के रूप में अकबर को स्थापित कर देगा।

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