अखिल पांडे
आज गोंदली के फोकला में ऐसे शख्स की परत निकालने की कोशिश है जो हर राजनीतिक झोंके से स्टील की दीवार की तरह खड़े नजर आते हैं। एक पार्षद से लेकर मुख्यमंत्री की यात्रा और फिर पांच साल के राजनीति में हाशिए रहने के बाद नया सवेरा की तरह चमक रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का आज 71 वां जन्मदिन है। उनके बारे में वे बातें जो कम लोगों को पता है उसे आप लोगों के बीच लेकर आया हूं। हालांकि शुरुआत अपने से। पत्रकारिता की भूमिका समय के साथ और भी प्रासंगिक हो चुकी है जब ऐजेंडा वाले पत्रकार एक्सपोज हो रहे हैं। इसलिए अपनी बात पहले, जिससे मेरी संस्मरण की तारतम्यता और डॉ. रमन सिंह का बिता कल दोनों साथ-साथ चलते रहे।
रायपुर के बाद कवर्धा में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में
बात 2006 की है। उन दिनों रायपुर में ईटीव्ही व सहारा न्यूज चैनल में काम करने का बड़ा क्रेज था। मैं और प्रशांत दुबे साथ में काम करते थे। फिर हम दोनों अलग मीडिया संस्थान में ज्वाइन किया। अब हम लोग भी ईटीव्ही में काम करने का मन बनाया। प्रशांत दुर्गा कॉलेज, रायपुर में छात्र संघ सचिव रह चुका था। उसका दृष्टिकोण गजब का होता था। यही कारण है कि रायपुर प्रेस क्लब में भी वह महासचिव के लिए चुना गया। मुझे दुनियादारी के बारे में ज्यादा समझ नहीं थी। प्रशांत का ईटीव्ही के ब्यूरो चीफ संजय शेखर व रिपोर्टर शैलेष पांडे से अच्छा जमता था। तो पहले ईटीव्ही से उसे इंटरव्यू का कॉल आ गया और महासमुंद संवाददाता के रूप में उसका सलेक्शन भी हो गया। सवा नौ हजार का मंथली पैकेज सुनकर मेरा मन भी कुलांचे मारने लगा। मुझे भी ईटीव्ही में काम मिल जाये यह सोच बनते जा रही थी। आखिरकार ईटीव्ही के रिपोर्टर शैलेष पांडे की सहायता से मुझे भी कॉल आ गया। 2006 सितंबर में हैदराबाद इंटरव्यू देने कुल 19 लोग पहुंचे थे। रायपुर से करीब एक दर्जन हम पत्रकारों का दल हैदराबाद पहुंचा था। प्रशांत के कारण मुझे भी विश्वास था, कि ईटीव्ही में मेरा सलेक्शन हर हाल में होगा। और कुल 3 लोगों का सलेक्शन हुआ उसमें मैं भी शामिल था। लेकिन तब एक गड़बड़ झाला हो गया। मेरी पोस्टिंग कोरबा हुई थी। लेकिन मेरा कैमरा खराब होने के कारण मुझे सही कैमरा लाने के लिए कहा गया था। मैं बिना समय गंवाए दूसरे दिन ही रायपुर वापस लौट गया। करीब चार-पांच दिन बाद मैं हैदराबाद पहुंचा तो मेरे साथ मनोज सिंह व सतीश साहू का ट्रेनिंग खत्म होने वाला था। सतीश साहू ने बताया कि, मेरी पोस्टिंग कोरबा हुई थी। लेकिन मनोज ने गलत जानकारी दे दी कि, अखिल को ईटीव्ही पसंद नहीं आया और वह वापस चला गया है। जिसके बाद उसकी पोस्टिंग बस्तर के नारायणपुर से कोरबा हो गई। जबकि सतीश साहू को रायपुर पोस्टिंग दी गई थी। क्योंकि वह बिलासपुर से था। मैं और मनोज तब रायपुर से थे। ईटीवी न्यूज में पत्रकारों को उनके होम टाउन में पोस्टिंग नहीं मिलती थी। दीगर जिलों के संवाददाता की नियुक्ति करते थे, ताकि अनजान शहर में निष्पक्ष भाव से ईटीव्ही की रिपोर्टिंग हो सके। यही कारण था कि उस समय ईटीव्ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पर्यायवाची बन गया था। यानी आम लोग न्यूज चैनल से रिपोर्टिंग करने वालों को ईटीव्ही वाले बोला करते थे। जैसे आज भी लोग वॉशिंग पाउडर को सर्फ या निरमा कहते हैं। मेरे वापस लौटने पर कवर्धा के संवाददाता रितेश तंबोली को बस्तर तबादला कर मुझे कवर्धा भेजा गया। मुझे हैदराबादी स्टाफ ने बताया कि, आपको कावरधा जाना है। मैंने उनसे फिर पूछा, आप कवर्धा बोल रहे हैं क्या? उसने हां में जवाब देते हुए कहा “हां वही।” कवर्धा नाम सुनकर सोचने लगा यहां जाना सही रहेगा क्या? दरअसल, रायपुर में काम का शेड्यूल इस तरह से था कि, प्रेस में शाम सात बजे से सुबह तीन बजे तक काम करना पड़ता था। जिससे मुझे परेशानी होती थी। इसलिए काफी सोच-विचार कर हामी भर दी। करीब 10 दिनों तक रायपुर में रिपोर्टिंग के बाद 13 अक्टूबर को बस में कवर्धा के लिए रवाना हो गया। मेरे साथ मित्र अतुल पाठक भी साथ में था।

पहले कार्यकाल में रमन सिंह
तब मैं रायपुर अमृतसंदेश में काम करता था। हमारे सिटी चीफ राम अवतार तिवारी थे। उन्होंने बताया कि, वे भाजपा नेता संतोष पांडे को फोन कर चुके हैं तुम चले जाओ वहां जाकर उन्हें( संतोष पांडे ) फोन कर देना। कवर्धा जाने से पहले संतोष पांडे से फोन पर बात हुई। तो उन्होंने बताया कि आप अच्छे मौके पर आ रहे हैं। कल ही मुख्यमंत्री जी का जन्मदिन है। और इस बार वे अपने गृह ग्राम ठाठापुर ( अब रामपुर) में जन्मदिन मनाएंगे। हमारे ब्यूरो चीफ संजय शेखर ने बताया कि, कलेक्टर सोनमणि बोरा पहले से ही ईटीव्ही में किसी संवाददाता की जल्द नियुक्ति की मांग कर रहे थे। तुम्हारे जाने से वे भी खुश हैं। सबसे पहले कवर्धा पहुंचे तो रेस्ट हाऊस गए। यहां पर किसी तरह रुकने की व्यवस्था हो गई। दूसरे दिन रेस्ट हाउस के बाहर काफी भीड़ थी। मैं रामपुर जाने के लिए सुबह से तैयार हो गया था। मैंने देखा कि पूरा प्रशासन का अमला सर्किट हाउस में मौजूद था। यहां बरामदे में चार-पांच लोग आपस में मंत्रणा कर रहे थे। मेरा छोटा भाई का दोस्त शिवेन्द्र मुझसे मिलने पहुंचा था । उसने पंद्रह फीट दूर से उंगली दिखाकर बताया कि, वह जो दिख रहा है वह कलेक्टर सोनमणि बोरा है। मैंने उंगली दिखाने से मना किया। मैंने पूछा कौन है कलेक्टर ? शिवेंद्र ने बताया जो बीच में है वही। लेकिन मुझे समझ नहीं आया। क्योंकि वहां पर एसपी आनंद छाबड़ा व दो और प्रोबेशनरी आईएएस अमित कटारिया व रजत कुमार साथ में थे। लेकिन कलेक्टर का शर्ट का कलर बताने पर बोरा साहब को देख मैं कौतूक से भर गया। इतनी कम उम्र के कलेक्टर मैं पहली बार देख रहा था। मुझे लगता था कि सोनमणि बोरा अच्छे डील-डौल शरीर के और मुझसे अधिक उम्र के होंगे। क्यों कि रायपुर में वे निगम कमिश्नर थे, तो उनका नाम और कार्यशैली से पहले ही परिचित था। लेकिन इतने कम उम्र के कलेक्टर व अन्य आफिसर देखकर मन बड़ा अच्छा लगा।
हालांकि कायदे से मुझे कलेक्टर सहित सभी अफसर को अपना परिचय देना था। लेकिन उस समय पत्रकारिता का ऐसा नशा था कि, सीधा ठाठापुर रिपोर्टिंग के लिए निकल गए। इसका नतीजा यह हुआ कि, जो कलेक्टर सर्किट हाउस में बार-बार मेरी तरफ देख रहे थे वे ठाठापुर में मुझे नजरअंदाज करने लगे। ठाठापुर में मंत्री राजेश मूणत की देखरेख में तैयारी चल रही थी। मुझे डॉ. रमन से मिलने की ललक नहीं थी, क्योंकि राजधानी में रहते मुख्यमंत्री के कार्यक्रम होते रहते थे, जहां मैं अकसर रिपोर्टिंग में जाता था। लेकिन उनके बारे में जानने की ऐसी ललक थी, जिसे मैं रिपोर्टिंग कर आम जनता को बताने के लिए काफी उत्सुक था । इसलिए वहां ग्रामीणों से मुलाकात कर डॉ. रमन सिंह व उनके परिवार के बारे में जानने के लिए बहुत उत्सुक था।
डॉ. रमन के आंगन में पांच पेड़ों वाला बरगद
दूसरे दिन 15 अक्टूबर को दोपहर मुख्यमंत्री सपत्निक ठाठापुर पहुंच गए। सबसे पहले कुल देवी की पूजा-अर्चना की गई। यहां उनके पुराने घर के आंगन में बरगद का पेड़ था, जिसके ऊपर तीन अन्य पेड़ भी साथ उगे हुए थे। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने बताया कि, पहले इसमें पांच पेड़ थे, एक पेड़ सूख गया। कुलदेवी की पूजा के दौरान कलेक्टर सोनमणि बोरा मौजूद थे। लेकिन वे मुझे नजर अंदाज कर रहे थे। लेकिन मैंने उनके सामने जाकर नमस्ते किया। उन्होंने हाथ में ईटीव्ही की आईडी देखकर पूछा, पांडे? मैंने कहा हां मैं अखिल पांडे। चंद सेकंड बात हुई फिर कुछ देर में कार्यक्रम स्थल के लिए सब रवाना हो गए, जहां पूरे प्रदेश व अन्य राज्यों से भी लोग बधाई देने के लिए लोगों का तांता लगा हुआ था।
डॉ. रमन माह में तीन-चार बार कवर्धा आना होता था
दो विधानसभा क्षेत्रों वाले कवर्धा जिले को राजनांदगांव व बिलासपुर जिले को तोड़कर 1998 में नया जिला बनाया गया। 2003 में सरकार बनाने के बाद डॉ. साहब को दो से तीन बार दौरा होता था और चार बार भी हो जाता था। तीन से कम दौरा होने पर डा. साहब की नाराजगी की बात शुरू हो जाती थी। जिसके बाद स्थानीय नेता सक्रिय हो जाते थे। अपने गृह जिले में अधिकांश प्रमोटी आईएएस को कलेक्टर बना गया। लेकिन कवर्धा की सूरत तब बदली जब जांजगीर कलेक्टर रहे सोनमणि बोरा को 2006 में कवर्धा कलेक्टर बनाया गया। उस पर भी अमित कटारिया एसडीएम थे। मतलब हर तरह से सख्त प्रशासन की नींव रखी गई। मैं 14 अक्टूबर को कवर्धा पहुंचा था। तब कवर्धा हर तरफ खंडहर दिखाई दे रहा था। क्यूंकि सड़क चौड़ीकरण के लिए कड़ाई के साथ अतिक्रमण हटाए गए थे। निर्माण कार्य में भी तेजी दिख रहा था। एसडीएम कटारिया और अपर कलेक्टर के बोलने से ही ठेकेदार काम करने में पूरी मेहनत करते थे। क्यूंकि उन्हें मालूम था कि, कलेक्टर के सामने जाना यानी मुसीबत को बुलाना था। बड़े स्तर पर मुझे बताया गया कि 2003 में सरकार बनाने के बाद प्रशासन में टाइम पास होता था। कवर्धा के स्थानीय नेता पार्टी हित को लेकर गंभीर नहीं थे। यही कारण था कि प्रशासन सुस्त था। पार्टी नेता जमीन की जमीन अपने नाम कराने या फिर ठेके के लिए लगे रहते थे। नतीजा यह हुआ कि भ्रष्ट स्थानीय नेताओं को डा. साहब ने सुनना बंद कर दिया। और यही कारण है कि नये कलेक्टर भी स्थानीय नेताओं को तवज्जो नहीं देते थे। स्थिति यह थी कि, कलेक्टर द्वारा पत्रकारों को अधिक तवज्जो दिए जाने पर इक्का-दुक्का नेता राजनीति छोड़ पत्रकार बन गए। लेकिन कलेक्टर बोरा के तबादले के बाद कुछ पत्रकार राजनीति में पहुंच गए। खैर, आज जिनका जन्म दिन है उनके बारे में अधिक से अधिक जानकारी देने की कोशिश होगी।
गोंदली के फोकला ( प्याज के छिलके) परत दर परत निकालते चलते हैं। लेकिन इस प्याज का अंकुर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह हैं। क्योंकि आज भी वे उतने ही प्रासंगिक हैं। आज प्रदेश भाजपा में जो कुहासा बना हुआ था वह छंट चुका है। लोगों में भ्रम हो चुका था कि, डॉ. साब की पारी समापन की ओर है। लेकिन हर दिन के साथ आज सुबह तक पॉलिटिक्स 360 डिग्री घूम चुकी है। अपनी सोच थी कि, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ पाटन से विजय बघेल को टिकट दिया गया है, तो यह तय हो जाना चाहिए की किसी भी भाजपा उम्मीदवार के खिलाफ डमी कैंडिडेट की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। लेकिन आज कांग्रेस प्रत्याशियों की लिस्ट आने के बाद यह पता चलता है कि वास्तविकता मेरी सोच के खिलाफ है। अब भी डा. रमन सिंह की ऊंचाई राजनीति में टावर की तरह है। जहां सब कुछ बौना है। लेकिन संकेत यह भी करना चाहूंगा कि, विश्वास अन्य लोगों पर भी किया गया था। लेकिन जिस विश्वास पर उन्हें मौका दिया गया वे हरा-हरा चारा देख बजाय इसके कि, अपना खूंटा हिला हिलाकर उखाड़ते ताकि गहराई का पता चले, लेकिन उसने तो सीधा खूंटा ही तोड़ डाला और चारे पर टूट पड़े।
आज भी और कल भी डॉ. रमन सिंह
कवर्धा पहुंचकर एक बात को लेकर बड़ा ही कौतुक था कि, डॉ. साब का राजनीतिक सफर कैसा था। किस तरह से राजनीति में वे अपने आपको स्थापित किया। मैं जिस घर में किराए से रहता था ठाकुर पारा में, वहां रहते हुए पता चला कि, इसी वार्ड से डॉ. साब पार्षद चुने गए। उनके अपोजिट में चुनाव लड़ने वाले विश्वनाथ शर्मा भी पास में ही रहते थे। डॉ साब के साथ पढ़े लोगों से मुलाकात की तो उन्होंने बताया कि, वे शुरू से कम बात करते थे। नजर मिलाकर बात नहीं करना भी उनकी सबसे अलग आदत है। उनके पिता स्व. विघ्नहरण सिंह काफी तेज-तर्रार थे। जिस हिसाब से डॉ. साब और उनके अनुज आनंद सिंह हैं। विघ्नहरण सिंह को अपने पुत्र की साधुता पसंद नहीं आती थी। कई बातों को लेकर डॉ. रमन सिंह का सीधापन उनको खलता था। लेकिन जब 2008 में एक बार फिर से मुख्यमंत्री बन कर कवर्धा लौटे तो उनका चेहरा और उनकी बात देखने-सुनने लायक था। अपने पुत्र पर ऐसे मुग्ध हुए थे कि, मुंह से बात फूटते नहीं थकती थी। वह वीडियो आज भी मेरे फेसबुक में है। विघ्नहरण सिंह आम जनता की शिकायतों पर अधिकारियों से लैंड लाईन फोन से बात करते थे। वे अधिकारियों को गरीबों का काम नहीं होने पर फलाने काम क्यों नहीं हुआ इस पर पूछते थे। कुछ एक बार बात सामने आई की जो नये अधिकारी आते थे, वे कवर्धा सीएम हाउस का नंबर नहीं सेव नहीं कर पाते थे । तो अधिकारी की तरफ से यह पूछ लिया जाता था कि, आप कौन बोल रहे हैं ? जिस पर श्री सिंह भड़ककर बोलते, मैं मुख्यमंत्री का बाप बोल रहा हूं। इतना बोलना ही काफी होता था ,काम पूरा होने के लिए।
मुख्यमंत्री के परिवार को कैमरे में ट्रैप करने के लिए मुझे फोन
पत्रकारों की दुनिया में भी ऐसे नमूने किस्म के लोग होते हैं जो गंभीर विषयों पर कुछ भी बोल देते हैं। कैमरामैन अगर शांत चित्त नहीं है तो वहीं सबसे बड़ा दुश्मन है। राजधानी में प्रसाद भी कुछ इसी तरह था। कवर्धा पहुंचे मुझे दो-चार माह हुए थे। एक नेशनल न्यूज के कैमरामैन प्रसाद एक दिन फोन किया। उसने डॉ. साब के परिवार वालों के बारे में जो राजधानी में चर्चा है उस पर बात की। फिर उसने यह भी सलाह दी की मैं सीएम के परिवार वालों को कैमरे में ट्रैप करुं। यह बात सुनकर मेरी हालत खराब हो गई। फिलहाल तो प्रसाद से बात खत्म कर मैं अपने काम में लग गया। लेकिन इस बात को सोचकर मैं काफी बेचैन हो गया और मैं सोचने लगा कि, कवर्धा मुख्यमंत्री का गृह जिला है। ठाकुर परिवार है। इस तरह के कोई भी काम अगर करता भी है तो सुई मुझ पर आकर अटेगी। मैं चिंतित हो गया। लगता था कि, मैं किसी दिन बेमौत मारा जाऊंगा। बाद में धीरे-धीरे कवर्धा समझ आने लगा। यहां राजेश शुक्ला मेरे साथ बिलासपुर में पढ़ा था। वह मोहम्मद अकबर का प्रतिनिधि था। उससे बात करने पर मुख्यमंत्री परिवार के बारे में अधिक जानकारी मिली। बताते हैं कि, किसी चुनाव में कांग्रेस की जीत होने पर कवर्धा सीएम हाउस के सामने कांग्रेस के लोगों ने फाटके फोड़े। लेकिन किसी ने इसका प्रतिकार नहीं किया। कांग्रेस शहर अध्यक्ष दिनेश मिश्र, कांग्रेस जिलाध्यक्ष रहे स्वर्गीय अवस्थी जी ने कवर्धा का पूरा नक्शा ही खींच दिया। जिससे पूरे परिवार की साधुता का पता चला।
कवर्धा में भाजपा की वह बखत नहीं थी, जो कांग्रेस की थी
आप समझ सकते है कि जिस जिले का व्यक्ति प्रदेश का मुख्यमंत्री है, उनके जिले में एक भी भाजपा का विधायक नहीं था। विरेंद्रनगर के विधायक मोहम्मद अकबर थे। जो रायपुर में रहते थे। उनके बारे में केवल सुनता था, लेकिन उनको 2008 के विधानसभा चुनाव के पहले कब देखा था यह याद नहीं। अलबत्ता कवर्धा विधायक राजा योगेश्वर राज सिंह से मुलाकात होते रहती थी। वे काफी सक्रिय थे। भाजपा सरकार होने के बाद भी भाजपा नेताओं में वह बखत नहीं थी जो तेवर कांग्रेस के नेताओं में देखने को मिलता था। यह बात राजनांदगांव लोकसभा उपचुनाव में भी देखने को मिला। जब देवव्रत सिंह सभी विधानसभा सीटों में लीड कर चुनाव जीत गए थे। यह वह समय था जब भाजपा का असर जिले में देखने को नहीं मिलता था। लेकिन 2008 में चाऊर वाले बाबा ने पूरी बाजी ही पलट कर रख दी। तब कवर्धा से सियाराम साहू जीतकर आए थे। जबकि मोहम्मद अकबर डी-लिमिटेशन के बाद अस्तित्व में आए पंडरिया से मामूली अंतर पर चुनाव जीते थे। मुझे अच्छी तरह से याद है डॉ. रमन सिंह ने कवर्धा शहर के मध्य हुई सभा में भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ आम लोगों को भी कहा था, “कवर्धा में सियाराम साहू को जीत दिलाना होगा। नहीं तो कवर्धा के लिए सीएम हाउस का द्वार बंद कर दिया जाएगा।” तब मैं यह भी बता दूं कि, भले ही जिले की दोनों सीट से कांग्रेस का विधायक होते थे। लेकिन आम लोग अपनी कार के पीछे बड़े अक्षर में कवर्धा लिखकर चलते थे और राजधानी रायपुर सहित अन्य जिलों में बेरोकटोक फर्राटा भरने का लुत्फ उठाते थे। यही कारण था कि, डॉ. रमन सिंह ने बकायदा सख्त लहजे में यह हिदायत दी कि, हवा-हवाई नेतागिरी के बजाय जमीन में काम करने का संदेश दिया गया। आमजन को भी संदेश था, जिनकी पहुंच सीधे राजधानी के सीएम हाउस तक थी वे भी भाजपा को गंभीरता से सोचने पर मजबूर हो गए थे।
स्टील की दीवार वाले नेता
2008 में चुनाव जीतने के बाद कवर्धा में डॉ रमन सिंह ने अपनी सभा में कहा था, कि पुल-पुलियों,सड़क आदि के निर्माण से ही चुनाव नहीं जीता जाता। नेतृत्व करने के लिए नियत की आवश्यकता होती है। अगर काम करने की नियत हो तो जनता भी दिल से चाहती है। उनका ईशारा गरीबों के लिए चावल देने की योजना पर था। 2010-11 आते-आते उन्हें भारत के सबसे बड़े नेताओं में गिना जाने लगा। जो नक्सल समस्या को खत्म करने लिए एक बड़ा नेता माना जाने लगा। लेकिन मोदी का आईडिया आफ इंडिया एक अलग ही दौर में चला गया। 2013 का चुनाव जीतने के बाद भी मोदी की चमकीली छवि के बीच ऐसा लगता था कि, डॉ.रमन सिंह का आइकोनिक छवि इनरिलेवेंट हो रही है। उनके एप्रोच या उनके तरीके पर बहस होना बंद हो गया था। राहुल द्रविड़ की तरह चीन की दीवार वाली इमेज पर अब भरोसे की जगह टी-20 जैसी इमेज पर लोगों काे अधिक भरोसा बनने लगा था। 2018 के चुनाव के बाद डॉ. साब को राजनीति से टाटा, बॉय-बॉय जैसी बात यानी की गवर्नर बनाने की बात की जाने लगी थी। लोकसभा चुनाव हुए तो अभिषेक सिंह का टिकट काट दिया गया। फिर पिछले चुनाव के बाद लगता था की वे राजनीति की बियाबान में न चले जाए। लेकिन इन सभी बातों को वे गलत साबित करते गए। 30 सितंबर को बिलासपुर में मोदी की सभा में भी डॉ. रमन सिंह की उपेक्षा देखने को मिली। लेकिन इसे भी डॉ. रमन ने झूठा साबित किया।
अपना माथा तब ठनका जब पत्रकारों से सवाल-जवाब में उन्हें टिकट नहीं देने की बात पर सवाल किया गया। तो उन्होंने अचानक से कहा कि, वे राजनांदगांव से चुनाव लेड़ेंगे। यह अचानक रिएक्ट करने की उनकी आदत है। तब उनका गुस्सा देखने लायक होता है। इसका शिकार मैं भी हो चुका हुूं। लेकिन राजनांदगांव से चुनाव लड़ने की बात करने पर साफ समझ में आ रहा था कि वे पूरी तरह विश्वास से भरे थे। दूसरी लिस्ट जब निकली तो मैंने लोगों से बात की तब पता चला कि माजरा क्या है। बहुतों के चेहरे उतरे हुए थे। यह अलग बात है कि मजबूरी में पुराने हारे हुए चेहरे रिपीट करने पड़े। अब जबकि उनका राजनांदगांव से चुनाव लड़ना तय हो चुका है और आज उनके खिलाफ कांग्रेस से गिरीश देवांगन को चुनाव में उतारने का फैसला हुआ है। इधर गृह मंत्री अमित शाह नामांकन के दौरान कल राजनांदगांव में डॉ. रमन सिंह के साथ होंगे तो यह छवि एक बार फिर से उभर रही है। जहां पर बड़ी संख्या में नेता चल रहे हैं और उसके बीच में शांत भाव से सिर झुकाए छः फीट के नेता उजले कपड़े में दूर से दिखाई दे रहा है। वह पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह हैं जो हर कोई पहचान सकता है क्योंकि भीड़ में भी यह डील-डौल छुपाए नहीं छुपता।
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