अखिल पांडे
सरकारी ठाठ को टाटा-बॉय बॉय
राज्य में विधानसभा चुनाव तारीखों की घोषणा हो चुकी है। यानी पांच साल के सरकारी ठाठ-बाट का अंत हो गया । चुनाव घोषणा के साथ ही आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू हो जाती है और सरकारी सुविधाओं की वापसी की कार्रवाई भी। पिछले चुनाव घोषणा के बाद देखने में आया कि, जनप्रतिनिधियों से सरकारी वाहन बीच रास्ते में ही ले लिया गया । केंद्र में भाजपा की सरकार होने के कारण इस बार अफसरों को निष्पक्ष दिखने का दबाव स्वाभाविक रूप से है। सो कही पर अफसर सख्त कार्रवाई करते हैं तो बड़ी बात नहीं होगी। जिन मंत्रियों के स्वागत और विदाई के लिए प्रशासन का अमला आगे-पीछे लगा रहता था। उन मंत्रियों से अधिकारियों को मुलाकात करने की भी मनाही हो जाएगी। इस तरह भेंट- मुलाकात चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन माना जाता है। राजनीतिक व्यक्ति को गेस्ट हाउस में रुकने की मनाही होती है। सरकारी अमले जो हमेशा मंत्रियों के साथ रहते हैं उनको वापस बुला लिया जाता है। सरकारी वाहनों का अधिग्रहण कर लिया जाता है। यहां तक की शासकीय कार्यालय व अन्य स्थानों पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री सहित अन्य मंत्रियों के चित्रों और नामों को हटा लिया जाता है।
भाजपा प्रत्याशियों की वायरल लिस्ट
भाजपा की पहली लिस्ट के विरोध के बाद अब मीडिया में लीक हुई दूसरी लिस्ट की वजह से भाजपा में बेचैनी साफ देखी जा सकती है । हालांकि दूसरी लिस्ट कभी जारी हो सकती है लेकिन तथाकथित दूसरी लिस्ट लीक होने के बाद लगातार विरोध की नौबत आ रही है। रविवार को प्रदेश भाजपा कार्यालय में बड़ी संख्या में लोग वायरल लिस्ट के खिलाफ विरोध जताने पहुंचे थे। वास्तव में दूसरी लिस्ट लीक होने के बाद भाजपा में अजीब स्थिति देखने को मिल रही है। लोगों को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर पार्टी में हो क्या रहा है। हालांकि यह एक रणनीति के तहत लिस्ट लीक होने की बात की जा रही है और मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने यह आरोप भी लगाया कि, लीक करना एक षड्यंत्र का हिस्सा है। लेकिन वास्तव में अगर ऐसा होता तो भाजपा नेताओं में मायूसी यूं नहीं देखी जाती। वैसे कांग्रेस प्रत्याशियों की लिस्ट भी सोशल मीडिया में वायरल है। पर कांग्रेस में कोई प्रतिक्रिया नहीं है। जबकि भाजपा में ऐसा नहीं है। भाजपा में पहली लिस्ट जारी होने पर जो उत्साह नजर आया था, वह मीडिया में आए लिस्ट की वजह से मायूसी में बदल गई है। सीधी बात है कि पिछली सरकार के सभी चेहरे जो हार चुके हैं, उन्हें फिर से टिकट दिए जाने का हल्ला बना है उससे कार्यकर्ताओं में निराशा छा गई है। दरअसल, मीडिया में लिस्ट लीक होने के बाद कई लोग चुनाव तैयारी में इस तरह से लग चुके हैं कि, कुछ कार्यकर्ताओं को मैनेज करना शुरू कर दिया है। जिससे प्रतिद्वंदियों का चिंतित होना स्वाभाविक है।
मोदी-शाह की जोड़ी से यह क्या हो गया !
देखिए मीडिया हाऊस की अपनी सीमाएं होती है। जिसकी वजह से हर खबरों को एक्सपोज करना आसान नहीं होता। लेकिन एक मंडल स्तर के पदाधिकारियों को भी मालूम है कि, प्रदेश भाजपा में क्या से क्या हो गया है। जो पीएम मोदी कार्यकर्ताओं की सभा में गरज रहे थे और रायपुर में होने वाली पार्टी बैठकों में अमित शाह की नाराजगी मीडिया में सुर्खियां बनती थी, इससे नाराज कार्यकर्ता उत्साहित होते थे। कार्यकर्ताओं को लगता था कि, अब जमीनी नेताओं की पूछ-परख बढ़ेगी। लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ? क्या मोदी-शाह कर्नाटक चुनाव नतीजों से या फिर पार्टी में पिछले दो-तीन दशकों से कुंडली मारे बैठे क्षत्रपों के सामने नरम पड़ गए हैं? इस तरह के सवालों को लेकर अंदर व बाहर से कार्यकर्ता घिरे हुए हैं। पिछले चुनाव में भाजपा का सूपड़ा साफ इसलिए हो गया था कि, जितने कार्यकर्ता थे उतने भाजपा वोट को नहीं मिले। यानी कार्यकर्ताओं में दंभी चेहरों के खिलाफ भारी आक्रोश था। जिन्होंने भाजपा को वोट देना उचित नहीं समझा। आज भी पिछली सरकार के मंत्रियों के खिलाफ गुस्सा कम नहीं हुआ है। भूपेश सरकार के खिलाफ जो सड़क की लड़ाई लड़ते वे एयर कंडीशनर रूम से बाहर नहीं निकले। ऐसे हारे हुए नेताओं को फिर से टिकट देने की खबर सुनकर कार्यकर्ता न केवल निराशा में डूब गए हैं, बल्कि पार्टी की टिकट से आश्वस्त हो चुके दिग्गज नेताओं के खिले चेहरे देखकर कार्यकर्ताओं में आक्रोश बढ़ गया है। आम कार्यकर्ताओं में बेचैनी का कारण यह भी है कि, मोदी-शाह की जोड़ी के फैसले को लेकर जो आस बंधी थी, वह फुर्र हो गया है। उनका कहना है कि लीक हुई लिस्ट में से अधिक से अधिक आधा दर्जन बदलाव हो सकता है। लेकिन बाकी हारे हुए लोगों को टिकट मिला, तो पार्टी की पिछली हार दोहराएगी।
बदले हुए चेहरों की चुगली भारी
दरअसल, भाजपा प्रत्याशियों की लीक हुई लिस्ट की सच्चाई जो भी हो, लेकिन भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेताओं में जो उत्साह देखने को मिल रहा था वह अब नहीं दिख रहा है। पहले पार्टी के अंदर दूसरी पंक्ति के नेता खुलकर बोलते थे कि, अधिकांश नेताओं की टिकट कटने वाली है। नये लोगों को अवसर मिलने की आस से उनके चेहरे में अजीब सा उत्साह दिखता था। उन्हें भरोसा था कि मोदी-शाह की जोड़ी अगर जमीनी हकीकत को आधार मानकर टिकट देती है उनका टिकट पक्का है। लेकिन अब उनके चेहरे चुगली करते हैं । थके हुए भाव से साफ झलकता है कि चिड़िया दाना चुग चुकी है। यहां तक की प्रदेश अध्यक्ष से मिलने वाले लोगों में भारी कमी आई है। यह एक तरह से राजनीति की स्पष्ट भाषा है, जहां पर बॉडी लैंग्वेज ही सब कुछ बयां कर देता है। लोगों का यहां तक कहना है कि, दूसरी पंक्ति के नेता पैसे की ताकत के सामने सर झुका लिया है। आज पार्टी टिकट को लेकर भाजपा मुख्यालय पहुंचे नेताओं को दिलासा भी नहीं मिल पाया। पार्टी के सह प्रभारी नितिन नवीन ने एक नेता को यहां तक कह दिया कि, भगवान का नाम लो देखो क्या होता है। दूसरे अर्थों में यह तय बात है कि, असंतुष्ट नेताओं को समझाने के लिए सह प्रभारी के पास भी शब्द नहीं है। साथ ही भगवान भरोसे वाली बात मायूसी से भरा वाक्य है। जिस पदाधिकारी को पार्टी के फैसले के प्रति विश्वास होता तो स्वयं दूसरे नेताओं को विश्वास बंधाकर विदा करते। लेकिन जो उनके पास है नहीं, वह वे कैसे आश्वासन दें ? अंततः भगवान के प्रति विश्वास रखने की सलाह देना भी एक बड़ा संकेत है कि मायूसी हर स्तर पर है।
साव को सलाह, कैसे करेंगे हैंडल
भाजपा की वायरल लिस्ट इस कदर हावी है कि लोरमी से बड़ी संख्या में साहू समाज के लोग अरुण साव से मिलकर चुनाव लड़ने से मना कर रहे हैं। दरअसल, राजनीतिक समीकरण कैसे बदल जाता है इसका कोई ठिकाना नहीं है। फिलहाल अंदर खाने खबर यह है कि अध्यक्ष जी को यह सलाह दी जा रही है कि वे लोरमी से चुनाव न लड़ें। क्यूंकि लोरमी सीट से जीत निकालना समाज के लोगों को संभव नहीं दिख रहा है। बताया जाता है कि राजनीतिक समीकरण अरुण साव के खिलाफ है। पार्टी के अंदर उन्हें चुनावी जीत से महरूम करने के लिए बड़ी ताकत लगी हुई है। इसका भय समाज के लोगों को अभी से हो गया है और यह भय उन तक पहुंचा दी गई है। अब देखने वाली बात है कि अरुण साव इसे कैसे हैंडल करते हैं।
बीजेपी में मायूसी का साइड इफेक्ट, कांग्रेस में बम-बम
टिकट के लिए प्रत्याशियों के नाम फायनल करने के पेचोखम होते हैं। यह पेचोखम कांग्रेस में कैसा था इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि स्क्रीनिंग कमेटी व कोर कमेटी की कई बैठकें मुख्यमंत्री सहित कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के बीच हुई। लेकिन मामला सुलझता नहीं दिख रहा था। अपन पहले ही आशंका जता चुके थे कि, कांग्रेस अध्य़क्ष मल्लिकार्जुन खड़गे प्रदेश की उलझी गुटबाजी को ठीक कर सकते हैं। लेकिन आश्चर्य यह कि कांग्रेस में गिनती के सीटों को छोड़कर बाकी सीटों पर सिंगल उम्मीदवारों पर सहमति बन गई है। यह भाजपा की उलझी राजनीति का साइड इफेक्ट नहीं माना जाए तो और क्या माना जाए? जहां विरोधी स्वर का कोई अता-पता नहीं है। यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी गुटबाजी से उबरने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में अन्य नेता व प्रदेश प्रभारी चार्टर्ड प्लेन से दिल्ली के लिए रवाना हो गए। माना जा रहा है कि 13 अक्टूबर को केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक होगी। जिसमें राज्य के प्रत्याशियों के नामों पर चर्चा होगी। नवरात्र में कांग्रेस की पहली लिस्ट जारी होने की पूरी संभावना बन रही है।
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