– अखिल पांडे
बिलासपुर
चार दिनों पहले राजस्थान व मध्य प्रदेश की राजधानियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा हुई। इन दोनों ही सभा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा को तवज्जो नहीं दिया गया। विधानसभा चुनाव करीब आने के साथ ही भाजपा की राजनीति जिस जगह पहुंच गई है वह राजनीतिक पंडितों के लिए काफी दिलचस्प है। यही कारण है कि बिलासपुर की सभा में चंद घंटे बाकी है तो इसके खास मायने बनते दिख रहे हैं। जो कि राज्य की राजनीति को नई दिशा दे सकती है।पीएम मोदी भोपाल में चार दिनों पहले बड़ी चुनावी रैली को संबोधित किया। सभा में पीएम मोदी मंच पर बैठे नेताओं में किसी का नाम नहीं लिया। “मंच पर विराजमान सभी नेता गण” बोलते हुए भाषण की शुरुआत की। तो वहीं जयपुर में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को बोलने का मौका नहीं दिया गया। इस सब के बीच मध्य प्रदेश व राजस्थान में राजनीतिक पारा हाई है। माना जा रहा है कि, शिवराज व वसुंधरा को हाशिए रखने की कोशिश भाजपा नेतृत्व द्वारा की जा रही है। लेकिन इससे भी बुरी स्थिति छत्तीसगढ़ की है। यहां पर पिछले 15 वर्षों से लगातार भाजपा की सरकार रही है। जबकि लगातार राज्य में 11 संसदीय सीटों में से हर बार 10 सांसद चुने गए और विधानसभा चुनाव में भारी पराजय के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ से 9 सांसद चुने गए हैं। इस तरह से राज्य में अब भी भाजपा मजबूत स्थिति में है। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व की मनसा कुछ अलग ही है। लगता है कि पहली पंक्ति के नेताओं को हाशिए पर रखने की तैयारी है। आज की स्थिति में कद्दावर मंत्रियों से भी अधिक पावरफुल महामंत्री विजय शर्मा व पूर्व आईएएस ओपी चौधरी हो चुके हैं। चौधरी पूर्व कलेक्टर रहे हैं, लेकिन विजय शर्मा कभी पार्षद भी नहीं बने उनकी सलाह अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। क्यूंकि मामला चुनाव का है ऐसे में अनुभवी नेताओं को आगे करने की आवश्यकता होती है। अब देखने वाली बात यह है कि शनिवार को प्रधानमंत्री की सभा में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को किस तरह से तरजीह दी जाती है।
इधर बीजेपी की दूसरी लिस्ट 1 या 2 अक्टूबर को आ सकती है। केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक भी इसी तारीख को है। जिस तरह से एमपी में वर्तमान सांसदों को टिकट दिया गया है, उससे यही लगता है कि छत्तीसगढ़ में सांसदों को विधानसभा चुनाव लड़ाया जाएगा। जबकि वर्तमान विधायकों को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कहकर उनकी जगह नये चेहरों को मौका दिया जा सकता है। लेकिन बड़ी बात कल के पीएम की सभा में यह देखने वाली बात होगी कि, क्या वे डॉ रमन सिंह के 15 वर्षों के कामकाज को याद करेंगे।
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