साप्ताहिक कॉलम- गोंदली के फोकला

साप्ताहिक कॉलम- गोंदली के फोकला


– अखिल पांडे 

प्रत्याशियों पर फैसला ऊपर वाले पर

केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक 13 सितंबर को हुई थी, लेकिन छत्तीसगढ़ को लेकर बैठक टल गई। पीएम के स्वागत में प्रदेश के बड़े नेता नहीं दिखे तब से अपना माथा ठनका था। बैठक के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष के यहां बैठक हुई थी। लेकिन केंद्रीय समिति में चर्चा नहीं होने के कई कथा-व्यथा हैं। स्थिति यह है कि दूसरी लिस्ट इस माह जारी होगी भी या नहीं इस पर भी कुछ कहना मुश्किल है। इधर कांग्रेस में की स्थिति कोई अलग नहीं है। स्क्रीनिंग कमेटी में पैनल बनाने में दिक्कत हो रही है। लेकिन जैसा कि, मैंने पहले ही कहा है कि कांग्रेस में अंततः कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के हस्तक्षेप के बगैर प्रत्याशियों की लिस्ट निकलना मुश्किल है, वह सही दिख रहा है। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी शैलजा व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल प्रत्याशी चयन को लेकर कितने गंभीर हैं यह मुख्यमंत्री निवास में होने वाली बैठकों से पता चलता है। स्क्रीनिंग कमेटी की बैठक शुक्रवार को भी हुई। बताया जाता है कि बीजेपी की  तर्ज पर जिस सीट में कांग्रेस कमजोर है, उन सीटों पर लिस्ट पहले निकालने के लिए सभी सदस्य राजी हो गए हैं। कुल मिलाकर भाजपा-कांग्रेस में टिकट का फैसला ऊपर वाले यानी दिल्ली में ही तय करेगा।

मोदी का औरा और सिंहदेव    

जी-20 बैठक की सफलता के बाद पीएम मोदी रायगढ़ पहुंचे थे। उनका औरा यानी आभा मंडल जब वैश्विक स्तर पर चमक रहा हो, इस स्थिति में उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव का पहली बार स्टेट प्रमुख के रुप में प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत करना कम सम्मान की बात नहीं है। इसके ऊपर सरकारी कार्यक्रम में पीएम मोदी के बगल में बैठना टीएस सिंहदेव के लिए बड़ी बात है। यही कारण है कि कार्यक्रम के दौरान सिंहदेव न केवल असहज नजर आए बल्कि पीएम के साथ वार्तालाप के दौरान दोनों का बॉडी लेंग्वेज यह बताता है कि पीएम मोदी बार-बार सिंहदेव को धन्यवाद देने की मुद्रा में दिखे। यानी कहने की आवश्यकता नहीं की उपमुख्यमंत्री, किस सदाशयता के साथ अपने शब्दों को पिरोये होंगे। जब माइक मिली तो सिंहदेव के उद्गार फूट पड़े और पीएम मोदी हाथ जोड़कर सिर झुका लिया। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा प्रदेश के लिए किसी तरह से भेदभाव नहीं करने की बात कही थी। लेकिन यह बात समझनी होगी कि, पीएम मोदी का वर्तमान आभा मंडल के बीच प्रधानमंत्री के सरकारी कार्यक्रम की अपनी गरिमा होती है। उस तरह देखें तो गरिमापूर्ण बात करने के लिए टीएस सिंहदेव को राजा माना जाता है। कुल मिलाकर टीएस सिंहदेव के खिलाफ बात जाती नहीं दिखती, क्योंकि मोदी के धूर विरोधी मुख्यमंत्री जी-20 के भोज में शांत खड़े नजर आए तब यहां घर की बात थी।

भाजपा-कांग्रेस के लिए बिलासपुर बेल्ट महत्वपूर्ण

राजधानी रायपुर में पीएम मोदी के कार्यक्रम के बाद अपने कॉलम में यह बात मैंने लिखी थी कि, पीएम का अगला कार्यक्रम राज्य में कहा होता है यह देखने वाली बात होगी। क्योंकि भाजपा जिस क्षेत्र में अपनी संभावना अधिक देखेगी वही पीएम मोदी का कार्यक्रम होने की संभावना है। जिसके बाद 14  सितंबर को पीएम का कार्यक्रम रायगढ़ में हुआ। अब अगला कार्यक्रम बिलासपुर में होना है। जैसा कि, मालूम हो कि बिलासपुर क्षेत्र में ही भाजपा को पिछले चुनाव में अच्छी सफलता मिली थी। 14 में से आधी सीटें मुंगेली, बिल्हा, भाटापारा, बेलतरा, मस्तुरी, अकलतरा, जांजगीर की सीटें हैं, जिन सभी सात सीटों की सीमाएं आपस में मिलती है। यानी प्रदेश की 90 सीटों में से जिन 14 सीटों पर जीत हासिल हुई, उनमें से भाजपा की आधी सीटें अकेले बिलासपुर के इर्द-गिर्द है। अब जब बसपा व जोगी कांग्रेस कमजोर है तो कांग्रेस के लिए भी इन्हीं क्षेत्रों में संभावना बढ़ गई है। कुल मिलाकर सबसे बड़ा चुनावी घमासान भाजपा-कांग्रेस के बीच बिलासपुर क्षेत्र में देखने को मिलेगा। इसमें एक बड़ा मोड़ आज रविवार को देखेगा,जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भाजपा के कोर वोट पर सेंध लगाने पहुंचेंगे। बिलासपुर में छत्तीसगढ़ी ब्राह्मण समाज का बड़ा सम्मेलन होगा। सम्मेलन में समाज के लिए बड़ी घोषणा की उम्मीद है। जबकि दो एकड़ भूमि सरकार द्वारा पहले से समाज को दिया जा चुका है। इधर भूपेश सरकार में हैवीवेट मंत्री रायपुर-दुर्ग क्षेत्र से अधिक हैं। चरणदास महंत, जयसिंह अग्रवाल व उमेश पटेल को वह रुतबा हासिल नहीं है, जो रायपुर-दुर्ग क्षेत्र में मुख्यमंत्री के साथ बड़े विभागों वाले मंत्रियों को हासिल है। इस हिसाब से देखा जाए तो बिलासपुर क्षेत्र का महत्व इस चुनाव में भूपेश सरकार के लिए भी बड़ा है।

मुख्यमंत्री के लिए दूसरी सीट की तलाश

क्या मुख्यमंत्री भूपेश बघेल दो सीटों से चुनाव लड़ सकते हैं। पाटन में भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल दमदार प्रत्याशी हैं। विजय बघेल पिछले चुनावी मुकाबले में भूपेश बघेल को हरा चुके हैं, वर्तमान में वे सांसद भी हैं। अमित शाह भी अपने सांसद को जीत दिलाने में किसी तरह कमी नहीं होने देंगे। सर्वे में कांग्रेस सरकार के रिपीट होने की संभावना जताई जा रही है, तो मुख्यमंत्री अपनी जीत के प्रति 100 प्रतिशत गारंटी चाहेंगे । परिणामस्वरुप यह सोच बन रही है कि क्या भूपेश बघेल दूसरी सीट से चुनाव लड़ेंगे। माना तो यह जा रहा है कि भूपेश बघेल कोटा से भी चुनाव लड़ सकते हैं, जहां पर जोगी कांग्रेस के कमजोर होने पर कांग्रेस अपने पुराने गढ़ को आसानी से जीत सकती है। इसका दूसरा फायदा यह है कि बिलासपुर क्षेत्र में मुख्यमंत्री के चुनाव लड़ने से जो प्रभाव बनेगा वह भी भाजपा के लिए भारी पड़ सकता है। लेकिन फिलहाल यह सब भविष्य के गर्त में है।

छत्तीसगढ़ी ब्राह्मण समाज को महत्व

एक तरफ जब मैं बिलासपुर क्षेत्र के महत्व की बात कर रहा हूं, तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ी ब्राह्मण समाज को भूपेश सरकार द्वारा महत्व दिए जाने से भाजपा को तगड़ा लगेगा। क्योंकि इसमें दो राय नहीं कि यह समाज भाजपा का कोर वोटर है। याद करें कि , उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज को साधकर बसपा पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बना पाई थी और भाजपा तीसरे नंबर की पार्टी बन गई थी। तब से सोशल इंजीनियरिंग राजनीति में नया शब्द जुड़ गया था। छत्तीसगढ़ में ब्राह्मण समाज भूमिहार समाज है। छत्तीसगढ़ में इसे गौंटिया या दाऊ कहते हैं। जिनकी जड़ें आज भी मजबूती से गांवों तक जुड़ी हुई है। गांवों में प्रभावशाली इस समाज के कांग्रेस की ओर जाने से भूपेश सरकार की ग्रामीण योजनाओं का महत्व बढ़ेगा।  इसके साथ ही प्रदेश में सॉफ्ट हिंदुत्व के मुद्दे पर भूपेश सरकार की स्वीकार्यता बढ़ेगी। ब्राह्मण समाज का सम्मेलन राजधानी के बजाय बिलासपुर में रखा गया है। किसी सामाजिक संगठन को दो एकड़ भूमि शायद पहली बार लीज में  मिला है। अब आज मुख्यमंत्री इस कार्यक्रम के लिए भवन निर्माण सहित अन्य सुविधा के लिए राशि की घोषणा कर सकते हैं। कार्यक्रम को सफल बनाने को लेकर मुख्यमंत्री के सलाहकार प्रदीप शर्मा बिलासपुर में डेरा डाले हुए हैं। जबकि व्यवस्था इतनी तगड़ी है कि पूरे प्रदेश भर से समाज को लाने की व्यवस्था हुई है। कार्यक्रम के सफल  होने पर एक बड़ा संदेश भूपेश सरकार के पक्ष में जाएगा। वहीं भाजपा के लिए अपनी रणनीति पर विचार करना होगा।

छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया अब पुरानी बात!
महादेव एप घोटाला और सौरभ चंद्राकर को लेकर जिस तरह देश-विदेश में नाम चल रहा है वह सामान्य नहीं है। छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया की बात की जाती है उसकी अपनी वजह है। अपनी पत्रकारिता काल में ऐसी कई घटनाएं सामने आती थी जहां क्राईम को लेकर पुलिस की धारणा अलग बनती थी। इसमें दो घटनाएं मुझे याद आती है, पहला एक बार बिहार शासन के श्रम विभाग द्वारा जिला प्रशासन को सूचना दी गई कि, बिहार के मजदूरों को बंधक बनाया गया है और उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। यह सूचना मिलते ही श्रम विभाग व पुलिस प्रशासन भौचक्का हो गया कि, छत्तीसगढ़ में बिहार के लोगों को बंधक बनाकर प्रताड़ना का मामला कैसे हो सकता है। इस धारणा के तहत यह सोच बनी कि, जरूर इस मामले में कोई झोल है। इस बारे में पता करने पर कहानी उलटी ही निकली। बिहारी मजदूरों द्वारा ज्यादा मजदूरी मांगने का दबाव बनाये जाने का मामला हकीकत में आया और जैसी की श्रम विभाग की सोच थी वह सही साबित हुई। दूसरा मामला पुलिस प्रशासन का है उत्तर प्रदेश की पुलिस एक प्रेमी जोड़े को खोजने छत्तीसगढ़ पहुंची थी। दरअसल, छत्तीसगढ़ से उत्तर प्रदेश गए एक युवा मजदूर वहां के कारोबारी की बेटी के प्रेम जाल फंस गया और दोनों भागकर छत्तीसगढ़ में कही अंडरग्राऊंड हो गए। लेकिन छत्तीसगढ़िया प्रेमी ऐसा कि कीपैड मोबाइल के जमाने में मोबाइल को साथ में रखा हुआ था और स्विच-ऑफ रखे मोबाइल को कभी ऑन कर बात भी करता था। पुलिस इस दौरान प्रेमी मजदूर से बात कर लेती थी। पुलिस इस तरह से पुचकारती थी कि, प्रेमी का मनोबल बढ़े और सामने आए। पुलिस अधिकारी भी कहते थे कि, एक छत्तीसगढ़ का मजदूर यह बड़ा काम कर दिया, जो यूपी की लड़की को प्रेमजाल में फंसा लिया। लेकिन अब बात एक दशक बाद की है। सौरभ चंद्राकर ने वह अपराध किया है, जिससे राज्य की पुलिस के बाद केंद्रीय एजेंसी रात-दिन एक किए हुए हैं। ईडी के चर्चित प्रमुख संजय मिश्रा के कार्यकाल की आखिरी उपलब्धि सौरभ चंद्राकर के कारनामों को उजागर करने में लगी थी। जैसा कि यह अनुमान था कि 15 सितंबर तक ईडी की बड़ी कार्रवाई की अनुगूंज देश में थी। वह सौरभ चंद्राकर के मामले में कार्रवाई हुई। कई राज्यों में ईडी के छापों से पता चला है कि, सौरभ चंद्राकर ने बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों व नेताओं पर बड़ा खर्च किया है। अकेले सौरभ की शादी में 2 सौ करोड़ खर्च डाले। यह देश की मीडिया में सुर्खियां बन रही है। सौरभ के दुबई में होने व उसे वापस लाने भारत सरकार कुछ कर पाएगी या नहीं इस पर सवाल उठ रहा है। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया वाली बात पुरानी हो गई है।

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