– अखिल पांडे
छत्तीसगढ़ को छप्पन वोल्ट का करंट
नक्सलवाद को छोड़कर राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने वाला फैक्टर छत्तीसगढ़ में रहा हो वह कम ही दिखता है और केंद्रीय सत्ताधीश भी छत्तीसगढ़ को लेकर बेपरवाही से काम लिया। तो लोकल लीडरशिप के अनुसार फैसले भी लिए। बताया जाता है कि, इंदिरा गांधी भी छत्तीसगढ़ में किसी विषय पर फैसला का बखत होता तो, यह कहते हुए निर्णय टाल देती थी कि,विद्या(विद्याचरण शुक्ल) से पूछ लो।इधर छत्तीसगढ़ में होने वाली मनमर्जी पर केंद्रीय नेतृत्व परवाह करते हुए नहीं दिखा। 17 अगस्त की शाम जो झटका छत्तीसगढ़ की राजनीति को लगा है उससे उबरना आसान नहीं है। उस दिन मैं भी रायपुर के रास्ते पर था। एमएलए, पूर्व एमएलए की शानदार गाड़ियां राजधानी की ओर फर्राटा भरते दिखी। यानी, करंट का झटका तो नहीं लेकिन कुछ बड़ा होने वाला है, यह अंदेशा राजनीतिक हलकों में तैर रहा था। जैसे ही बीजेपी की पहली लिस्ट जारी होने की जानकारी सामने आई उसके बाद भाजपा के साथ कांग्रेस खेमे में भी सन्नाटा छा गया। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल भी मीडिया से बचकर निकल गये। बताया जाता है कि मुख्यमंत्री पहली बार मीडिया से बचकर निकले। दरअसल, यह तब तय हो चुका था जब अमित शाह स्वयं राजधानी में रात रुककर चुनावी तैयारियों की रिपोर्ट लेकर दिल्ली पहुंच रहे थे। टिकट का वितरण से अंदाजा लगा सकते हैं कि, जमीनी पकड़ वालों को टिकट दिया गया। क्योंकि स्थानीय निकायों से निकले नेताओं पर अधिक भरोसा किया गया है। ट्रैक रिकार्ड के अनुसार उत्तर प्रदेश हो या फिर पूर्वोत्तर के राज्यों का किला जिस तरह से अमित शाह अपने कब्जे में किया था वह अंदाज भी छत्तीसगढ़ की तरह था। जमीनी पकड़ वाले और जीत की संभावना वाले नेताओं को पार्टी में लाना और फिर दूसरी पंक्ति के नेताओं को तवज्जो देकर नया इकोसिस्टम खड़ा किया गया। आज बीजेपी में स्थिति यह है कि वर्तमान विधायक भी अपनी उम्मीदवारी पक्की नहीं मान रहे हैं। माना यह जा रहा है कि भाजपा के आधे विधायकों के टिकट कट सकते हैं। इसमें दिग्गजों के नाम भी शामिल हैं। उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ने या फिर संगठन में भेजने की बात की जा सकती है।करीब दो माह पहले टिकट देकर बीजेपी ने अपनी जीत पक्की कर ली हो ऐसी कोई बात नहीं है। लेकिन रणनीति की बात करें तो कांग्रेस बैक फुट में है। समय से पहले टिकट देना कभी भी फायदे का कारण नहीं बना है। बड़ी पार्टियां ऐसी रणनीति पर काम नहीं करते। इसके फायदे कम नुकसान अधिक है। लेकिन देखिए भाजपा के पास इन 21 सीटों पर खोने को कुछ नहीं है। पर राज्य की राजनीति अब बीजेपी के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। सरकार का इकबाल यानी जो औरा होता है वह धुंधला हो गया है। जबकि आचार संहिता लगने के आखिर तक सरकार व मुख्यमंत्री का अपना जलवा होता है। लगता यह है कि बीजेपी के बुने जाल में कांग्रेस कहीं फंस न जाए। क्यूंकि जब से टिकट की घोषणा भाजपा ने की है कांग्रेस भी उसी ट्रैक पर चलने की कोशिश में लगी है। और सितंबर की शुरुआत में प्रत्याशियों की पहली सूची जारी करने की बात की जाने लगी है।
बिलासपुर क्षेत्र से दो ब्राह्मणों को टिकट
बिलासपुर क्षेत्र में भाजपा से ब्राह्मणों का मोहभंग हो गया है। यह पिछले चुनाव साफतौर पर दिखाई दिया है। इस बात की चिंता बीजेपी में दिख रही है। धर्मजीत सिंह के साथ एसडी बड़गैय्या का प्रवेश कायदे से सोचने वाली बात है। दरअसल, क्षेत्र में मनहरण लाल पांडे व बद्रीधर दीवान बड़े ब्राह्मण नेता रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे दोनों नेता हाशिए में चले गए और अब उनकी भरपाई करने वाले ब्राह्मण नेता पार्टी में नहीं हैं। पार्टी इस मामले को लेकर पूरी चिंता में है। लोरमी में भाजपा को जीताऊ उम्मीद्वार की आवश्यकता है। बड़गैय्या वन अधिकारी के रुप में लंबे समय से यहां तैनात थे। जिसकी वजह से वनांचल क्षेत्र में इनकी पकड़ है। इधर बेलतरा व बिलासपुर में से एक सीट पर ब्राह्मण उम्मीद्वार की उम्मीद की जा रही है।

ओपी के लिए आसान नहीं राह
ओपी चौधरी किस सीट से लड़ेंगे यह तय करना आसान नहीं है। रायगढ़ में खटराल और धनपति नेता ओपी को पचा नहीं पाएंगे। रायगढ़ के अलावा जांजगीर क्षेत्र के सभी सीट त्रिकोणीय मुकाबले वाले होते हैं जिसमें जांजगीर व सक्ती में कमोबेश त्रिकोणीय मुकाबला कम होता है। चौधरी के लिए सबसे आसान जांजगीर सीट है। और उनकी पहली पसंद भी है। क्यूंकि उन्होंने यहां कलेक्टरी की है। लेकिन प्रतिपक्ष के नेता की सीट भी है। बस संकेत यही है कि आलाकमान की वक्र दृष्टि से जो कंपन महसूस हो रहा है उसमें एक बात जांजगीर सीट पर होने वाले फैसले से अहसास हो जाएगा कि मोदी-शाह की जोड़ी क्या चीज है।

अटल पांव पर नजर
अटल भैया कौन सी सीट से चुनाव लड़ेंगे इस पर सबकी नजर है। बोले तो पूरे प्रदेश के कांग्रेस नेताओं की। अटल श्रीवास्तव कोटा के साथ बेलतरा सीट पर अपना आवेदन सौंपा है। इसमें कोई संदेह नहीं की बेलतरा का मिजाज पिछले कुछ वर्षों से लगातार बदल रहा है। एक तरह से शहरी आबादी की तरह बर्ताव मतदाताओं का सामने आ रहा है। दूसरी ओर कोटा कांग्रेस के लिए इस बार आसान रहने की उम्मीद में अटल कोटा क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं। हालांकि मतदाता भी परिपक्व होते जा रहे हैं। साइलेंट मनःस्थिति वाले मतदाताओं के कारण राजनीतिक पंडितों को सही आंकलन करना मुश्किल होता जा रहा है।
Author Profile







