अखिल पांडे
राष्ट्रीय पटल पर छत्तीसगढ़-1
आज गोंदली के फोकला यानी छिलका निकालने की बात अमित शाह के दौरे पर होगी। प्याज का छिलका निकालने पर फिर छिलका ही मिलता है। लेकिन कोशिश अपनी चेहरा दिखाने की है। देखना है मेरी कोशिश कितना कारगर है।
नया राज्य बनने के बाद राष्ट्रीय पटल पर हिन्दी भाषी राज्यों के मुकाबले छत्तीसगढ़ हाशिए में था। लेकिन नक्सली मामलों को लेकर हो या फिर राज्य की योजनाओं को लेकर छत्तीसगढ़ ने अपना मुकाम व पहचान बना लिया है। लेकिन असल बात जिस पर आज मेरा फोकस है वह राज्य की राजनीति पर है। अपना मानना है कि राज्य की राजनीति एक तरह से राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर रहा है। असम, उत्तर प्रदेश व हिमाचल प्रदेश में चुनाव अभियान के लिए जिस तरह से कांग्रेस पार्टी छत्तीसगढ़ पर निर्भर थी वह बात भी हिमाचल व कर्नाटक जीतने के बाद अब नहीं है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी की रसद आपूर्ति काटने के लिए केन्द्र छत्तीसगढ़ में एड़ी-चोटी एक कर दे यह बात भी नहीं है। लेकिन छत्तीसगढ़ की राजनीति को जिस तरह से मथा जा रहा है वह हैरान करने वाला है। आप क्रोनोलॉजी समझिए। जब अजय जामवाल को क्षेत्रीय संगठन महामंत्री बनाकर उनका मुख्यालय रायपुर बनाया गया था, तब भी भौकाल बना था। लेकिन ओम माथुर जैसे शख्सियत को भाजपा प्रभारी बनाये जाने से यह संदेश गया कि, छत्तीसगढ़ को भाजपा नेतृत्व हल्के में नहीं ले रहा है। क्यूंकि ओम माथुर इसके पहले गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के भाजपा प्रभारी बनाये गये थे। वे सख्त व सफल रणनीतिकार के रूप पहचान रखते हैं । उन्हें छत्तीसगढ़ में जवाबदेही देना क्या छोटी बात हो सकती है। उस पर भी कसर बाकी रह गया है जो स्वयं केन्दीय गृह मंत्री अमित शाह राजधानी में रात रुककर रणनीति बना रहे हैं। आखिर कौन सी बात है जो केंद्र की राजनीति को छत्तीसगढ़ प्रभावित कर रहा है।
राष्ट्रीय पटल पर छत्तीसगढ़-2
अगर आप याद करें कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कौन सा राज्य है जहां पर कांग्रेस दोबारा सत्ता में वापसी की हो। मैं गलत नहीं हूं तो वह केवल पंजाब है। लेकिन आप पार्टी को सरकार में आने से रोकने के लिए कांग्रेस की अमरिंदर सरकार की वापसी रणनीति के तहत हुई थी। तब प्रधानमंत्री ने एक बार तंज करते हुए कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते हुए कहा था कि पुडुचेरी और छत्तीसगढ़ तक कांग्रेस सिमट गयी है। लेकिन पंजाब में कांग्रेस सरकार को लेकर उन्होंने कहा था कि, अमरिंदर सिंह को कांग्रेस अपना मानती नहीं है। तब अमरिंदर सिंह की तरफ से कांग्रेस पार्टी को किसी तरह की मदद नहीं मिलती थी। इसके पहले 2011 में असम में कांग्रेस ने तीसरी बार सरकार बनाई थी। 2016 में भाजपा ने तरुण गोगोई की सरकार को कारगर रणनीति के तहत विधानसभा चुनाव में हरा दिया था।
हालांकि अपना दो दशकों से अधिक पत्रकारिता का अनुभव भी काफी कम है जो राष्ट्रीय राजनीति पर इतनी बड़ी बात करूं। लेकिन मैं अगर गलत नहीं हूं तो इस पर जरूर ध्यान दें कि, जो स्थिति असम में 2016 में थी वही स्थिति छत्तीसगढ़ में है। अगर राजनीति के जानकार इस बात को जानते हों, तो यह याद होगा कि, 2011 का असम चुनाव मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने सॉफ्ट हिंदुत्व के साथ राज्य में चुनाव लड़ा था जिसमें वे सफल हुए थे। लेकिन 2016 में भाजपा ने जो रणनीति बनाई थी उसकी काट कांग्रेस या तब के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के पास नहीं थी। यही एपिसोड भाजपा को दोहराना है जोकि सामान्य नहीं है। दरअसल, ब्रॉड मोदी के काट के लिए कांग्रेस का अगर कोई प्रयोगशाला है तो वह छत्तीसगढ़ है। जहां से दूसरी बार चुनाव जीतकर कांग्रेस पूरे देश की जनता को संदेश दे सकती है कि उनका आइडिया आफ इंडिया सही है। जहां हिन्दूओं का विश्वास जीतकर ग्राम विकास की बात को आगे बढ़ा सकती है। जरा विचार करें कि अगले साल 2024 में लोकसभा चुनाव के पहले देश में जो राम मंदिर निर्माण का काम पूरा होगा और हिन्दू ह्रदय सम्राट की छवि लिए ध्वजवाहक नरेन्द्र मोदी की जो तस्वीर उभरेगी उसके सामने कौन होगा। लेकिन छत्तीसढ़ में जिस नैरेटिव के साथ भूपेश बघेल सरकार यह तक पहुंची है वह कही न कही ब्रांड मोदी की छवि को डेंट लगाता है। अगर राज्य में कांग्रेस सरकार की वापसी होती है तो यह भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव के पहले बड़ा झटका होगा।
अमित शाह की रणनीति क्या होगी
जाहिर सी बात है कि जब देश के नंबर दो नेता छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की रणनीति तैयार करने राजधानी रायपुर आए तो हर उस गुंजाइश पर विचार होगा जो संभव है। यानी इस बारीकी में पड़कर समय खराब करना है कि अमित शाह एयरपोर्ट पर किसे मिले, किस नेता को कितना वजन दिया। वे यहां लल्लो-चप्पो करने याकि फोटो खींचाने नहीं आए हैं। अपना मानना है कि 2003 में छत्तीसगढ़ में जो रणनीति अपनाई गई थी उस पर अधिक फोकस होगा। जब बस्तर व सरगुजा में कांग्रेस का सफाया हो गया था। पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस को लगातार दोनों वनांचल क्षेत्रों में सफलता मिली है। लेकिन इस बार यह सफलता दोहराना आसान नहीं है। इसलिए इन क्षेत्रों के लिए विशेष रणनीति अपनाई जाएगी इसमें कोई दो राय नहीं है।
खुला खेल फर्रूखाबादी
राजनीति में कब समय की चाल उल्टी चलने लगती है यह भला कौन जान सकता है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सद्भावना के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अन्य केन्द्रीय मंत्रियों से मिलने के बाद जो फोटो अखबारों व सोशल मीडिया में आती थी, तो कई बातें उठती थी। लेकिन अब जिस तरह की राजनीति शुरू हो गई है उसके बाद बघेल पर कोई दबाव काम करता नहीं दिख रहा है। लगता है अब खुला खेल फर्रूखाबादी की तर्ज पर राजनीति की मैदान में सब उतर चुके हैं। मुख्यमंत्री बघेल आक्रामक नजर आ रहे हैं। उन्होंने विधानसभा में यह कहकर कान खड़े कर दिये कि, कोयले से गैस उत्पादन की मंजूरी नहीं देने के कारण केन्द्र सरकार उनके खिलाफ जांच एजेंसियों को पीछे लगा दी है।
भाजपा के चार चांद
प्रदेश भाजपा में जिस तरह से युवा पीढ़ी को तरजीह दी जा रही है उससे चार युवा नेताओं का भविष्य फिलहाल सबसे चमकदार नजर आ रहा है। इसमें तीन महामंत्री ओपी चौधरी, केदार कश्यप और विजय शर्मा। जबकि विधायक सौरभ सिंह का कद भी भाजपा में बढ़ता जा रहा है। मजे की बात यह है कि चारों नेताओं ने भाजपा में काम करके अपनी जगह नहीं बनाई है। बल्कि चारों का बैक ग्राऊंड अलग-अलग है। जहां ओपी नौकशाह रहे हैं तो केदार कश्यप कद्दावर भाजपाई बलीराम कश्यप के पुत्र हैं। वहीं विजय शर्मा की राजनीतिक पारी कांग्रेस से शुरू हुई है, जबकि सौरभ सिंह बसपा व कांग्रेस होते हुए भाजपा में आए। लेकिन आज की परिस्थिति में जो वजन इन नेताओं को मिल रहा है वह आने वाले समय में इन चारों का राजनीतिक भविष्य चमकदार होने की संंभावना व्यक्त की जा रही है।
राजनीति के सिकंदर
देश में सबसे लम्बे समय तक मुख्यमंत्री रहने का एक रिकॉर्ड टूट गया है। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने दूसरे सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकार्ड बनाया है। राजनीति कॉलम में इस बात की जरूर चर्चा होनी चाहिए। क्यूंकि नवीन पटनायक फिलहाल पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु का रिकॉर्ड ब्रेक किया है। हालांकि पहले पायदान पर सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन चामलिंग का नाम है। लेकिन नवीन बाबू का कार्यकाल अभी करीब 10 माह बाकी है। जबकि पवन चामलिंग 24 वर्ष से कुछ अधिक समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं।श्री पटनायक अगर बाकी बचे कार्यकाल पूरा कर लेते हैं तो पांच बार कार्यकाल पूरा करने वाले मुख्यमंत्री के तौर पर सबसे ऊपर पायदान पर नवीन बाबू का नाम होना किसी भी लोकतंत्र में आसान नहीं है। राजनीतिक पंडितों के लिए यह बड़ा शोध का विषय रहेगा।
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