बिलासपुर 02/07/2023
अखिल पांडे
एआईसीसी के उपमुख्यमंत्री
एआईसीसी के लेटर हेड से छत्तीसगढ़ के पहले उपमुख्यमंत्री की घोषणा होना क्या अजीब नहीं है? हालांकि, उपमुख्यमंत्री का कोई संवैधानिक आधार नहीं बनता। लेकिन दिल्ली में कांग्रेस की बैठक में जो जल्दबाजी दिखाई गई वह समझ से परे है। टीएस सिंहदेव को उपमुख्यमंत्री बनाने पार्टी के फैसले के बाद यह आदेश के रूप में राज्य शासन से या फिर मंत्रिपरिषद की बैठक में नोटिफिकेशन जारी किया जाता। लेकिन इससे अलग एआईसीसी के लेटर हेड में उप मुख्यमंत्री का दर्जा दिए जाने के फैसले की जानकारी दी गई। मुश्किल यह है कि दिल्ली में हुए फैसले के बाद अब तक राज्य शासन से ऐसा कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं हुआ है।
उप मुख्यमंत्री बनाये जाने का असर
टीएस सिंहदेव को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद राजनीतिक पंडित अपने-अपने हिसाब से नफा-नुकसान बताने में लग गए हैं। लेकिन अपनी थिसिस कुछ अलग है। अपना पत्रकारिता का करियर कुछ अलग है। न्यायधानी व राजधानी में पत्रकारिता का ककहरा सीखने के बाद न केवल छोटे जिलों में लैब टेस्ट किया, बल्कि गांव में खाक छानकर पत्रकारिता की। अपना पूर्वानुमान पिछले विधानसभा चुनाव में सौ टका सही साबित हुआ तो नगरीय चुनाव में भी फिट बैठा। पंचायत चुनाव में जो गांव के मंझे राजनीतिज्ञ थे, वे अपना भट्ठा बैठाकर घर में बैठे हैं। जो वोटिंग के ठीक पहले धनबल के दम पर वोटरों को अपने पक्ष में करने की कला में पारंगत होने का वहम पाले बैठे थे। बड़ी संख्या में धीर-रणधीर गांवों की राजनीति से एक झटके में बाहर हो गए। आम जनमानस चुनाव में ठगे जाने की बात अच्छी तरह से समझ चुकी है। यही कारण है कि कोई भी नैरेटिव को आम जनता कसौटी पर कस रही है। खैर, मैं भटक रहा हूं। मेरा विषय उपमुख्यमंत्री को लेकर है, कुछ लोगों का मानना है कि अब टीएस बाबा की नाराजगी दूर हो गई है तो पार्टी में एकजुटता दिखेगी। लेकिन अपना मानना है कि, आने वाले दिनों में पार्टी में खींचतान कम होने के बजाय बढ़ने की संभावना अधिक दिख रही है। एक तरफ जहां प्रदेश संगठन में मोर्चा खुल गया था, वह अब सरकार में भी देखने को मिल सकता है। चुनाव के ऐन वक्त उपमुख्यमंत्री बनाने का फैसला सीएम बघेल की छवि पर डेंट लगाता है। विरोधी खेमा जो उदासीन था वह फिर से सक्रिय हो गया है। पिछले साढ़े चार साल में सीएम बघेल ने जो अपनी छवि एक किसान, ग्रामीण विकास का नैरेटिव बनाने वाला और उससे भी अधिक एक ठेठ छत्तीसगढ़िया की छवि बनाई है वह नये अंतर्विरोधों में फंसने का डर है। राज्य सरकार के अंदर दो अलग-अलग बातें निकली तो आम जनता के बीच क्या संदेश जाएगा? इसका अंदाजा लगाया जाना चाहिए। वैसे भी टीएस सिंहदेव मंझे हुए राजनीतिज्ञ की तरह बात नहीं करते, जो इशारों में बहुत कुछ बोल दे। वे तो बिना घुमाए सीधा बोल देते हैं। जिसका विपक्षी दल किस तरह से अर्थ निकालकर फायदा उठाने की कोशिश करेंगे यह देखने वाली बात होगी। एक दिन पहले बिलासपुर में एक टीवी प्रोग्राम में भी टीएस बाबा ने स्वास्थ्य क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय काम नहीं होने के सवाल पर उनकी(टीएस बाबा) स्वीकारोक्ति अपने आप में एक उदाहरण है।
मुख्यमंत्री का बूथ मैनेजमेंट
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बूथ मैनेजमेंट में अभी से अपने आपको झोंक दिया है। बिलासपुर में जिस तरह दिन भर वार्डों का दौरा किया और कार्यकर्ताओं को समझाया उससे चुनाव को लेकर मुख्यमंत्री की गंभीरता दिखाई पड़ती है। शहर के राजेन्द्र नगर में हुए बूथ कार्यकर्ताओं को न केवल पूरा समय दिया बल्कि बूथ अध्यक्ष को अपना मोबाइल नंबर भी दे दिया और किसी भी वक्त सीधा उन्हें फोन करने की बात तक कह दी। आने वाले विधानसभा चुनाव में सीधा मुकाबला होने की संभावना की वजह से शहरी क्षेत्रों में वोटर्स को साधना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी। क्योंकि इस सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं में गांव प्राथमिकता में है।
कैबिनेट विस्तार जैसे हनुमान की पूंछ
पिछले 6 माह से केंद्रीय कैबिनेट में फेरबदल को लेकर कयास जारी है। लेकिन यह हनुमान की पूंछ की तरह नई तारीख के सात बढ़ जाती है। अब पूर्णिमा यानी कल सोमवार को कोई फैसला होने की बात कही जा रही है। आज महाराष्ट्र में भी बहुप्रतीक्षित राजनीतिक परिवर्तन हो गया है। यानी महाराष्ट्र से प्रतिनिधित्व को लेकर संशय मिट गया है। अब देखना यह है कि कल मंत्रिपरिषद की बैठक होती है तो उसमें क्या फैसला लिया जाता है। मंत्रिमंडल फेरबदल में छत्तीसगढ़ को प्रतिनिधित्व मिलना तय है। लेकिन किसे केन्द्र में मंत्री बनाया जाएगा इस पर कोई भी बताने की स्थिति में नहीं है। जितने लोग उतनी तरह की बातें। हालांकि यह सही भी है कि जहां मामला पीएम मोदी का हो तो कुछ भी मुमकिन है।लेकिन अपना दिमाग गुहाराम अजगले को लेकर अधिक प्रभाव में रहता है।
नेताओं के आंकड़ों की जादूगरी
छत्तीसगढ़ प्रदेश फूल चुनावी मोड में आ गया है। भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं के दौरे राज्य के अलग-अलग स्थानों पर हुए तो अरविंद केजरीवाल व भगवंत मान ने आज रविवार को बिलासपुर में बड़ी जनसभा को संबोधित किया। इधर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल बूथ मैनेजमेंट को लेकर अलग-अलग जिलों में जा रहे हैं। लेकिन इन दौरों में अपनी सरकार की उपलब्धि बताने में जो आंकड़ों की जादूगरी सामने आ रही है उससे पत्रकार दीर्घा में बैठे एक-दूसरे के चेहरे अचानक देखने पर विवश हो रहे हैं। जैसे पूछते हैं कि क्या वे सही बोल रहे हैं। यह बात भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा दिये जा रहे आंकड़ों पर दिखाई दिया तो अरविंद केजरीवाल के दावों पर पत्रकार अपनी हंसी नहीं रोक पाए।
राजनीतिक सभाओं में उत्साह की कमी
मोदी सरकार के 9 साल पूरे होने पर भाजपा नेताओं ने प्रदेश के अलग-अलग स्थानों पर सभाएं की। इस दौरान केन्द्र की उपलब्धियों को गिनाया गया। जहां पर स्थानीय मुद्दों को कम फोकस किया गया। कांकेर की सभा में राजनाथ ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया पीएम के बयान से लेकर हाईवे,ग्रोथ रेट को लेकर तमाम दावे किए। इस दौरान जनमानस के उत्साह में कमी जाहिर सी बात है। क्यूंकि विधानसभा चुनाव का जो समय है। इधर बिलासपुर में अरविंद केजरीवाल ने पूरे भाषण के दौरान एक बार भी भूपेश बघेल का नाम नहीं लिया। छत्तीसगढ़ में उनका क्या रोडमैप है यह स्थानीय लोगों को समझा नहीं पाए।
सभाओं में भीड़ आ रही है
आने वाला चुनाव जितना जमीनी स्तर पर लड़ा जाएगा उससे अधिक सोशल मीडिया में मुकाबला देखने को मिलेगा। लोग रोज मोबाइल में राजनेताओं के बयान से लेकर उनकी गतिविधियों को देख रहे हैं। ऐसे में राजनेताओं की सभाओं के लिए भीड़ जुटाना कम मेहनत का काम नहीं है। खेती में व्यस्त होने के बाद भी भाजपा व आम आदमी पार्टी की सभाओं में भारी भीड़ देखने को मिली। विपक्ष में रहकर पार्टियां भीड़ मैनेजमेंट कर रही है यह अपने आप में बड़ी बात है। हालांकि आप पार्टी की सभा में प्रदेश भर से लोग आए हुए थे।
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