साप्ताहिक – गोंदली के फोकला –

साप्ताहिक – गोंदली के फोकला –

अखिल पांडे

बिलासपुर 26/06/2023

इस कॉलम की पहली कड़ी में यह बात सामने आई की “गोंदली के फोकला” यानी प्याज के छिलके का इस कॉलम से क्या मेल है। दरअसल, यह राजनीतिक कॉलम है और राजनीति में जो दिखता है वह चेहरा नहीं होता यानी सच्चाई नहीं होती। नकाब के ऊपर नकाब की जो तहें हैं वहीं प्याज की संरचना है। प्याज में कोई फल नहीं होता बल्कि प्याज यानी छत्तीसगढ़ी में गोंदली अपने आप में छिलकों का समूह होता है। और यह राजनीति है, जिसका कोई चेहरा नहीं होता। मुखवटा उठाओ तो सामने जो तस्वीर आती है, बजाय इसके कि, चेहरा मिले वह भी मुखवटा निकलता है। अटल सरकार में मुखवटा विवाद याद होगा। जब गोविन्दाचार्य ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पार्टी का मुखवटा बताया था और लालकृष्ण आडवाणी को चेहरा माना गया था। लेकिन जिन्ना को सेक्युलर बताने के बयान के बाद लालकृष्ण आडवाणी की हैसियत किस तरह से बदलती गई यह सबको पता है। चेहरा और मुखवटे का खेल लगातार जारी है। प्रदेश के सत्ता और संगठन के बीच कुछ इसी तरह की बारीक कशमकश है। बस समझना आपको है।
गोंदली के फोकला
सप्ताह की सबसे बड़ी खबर
इस पूरे सप्ताह की सबसे बड़ी खबर मेरे मुताबिक बारिश है। बरसात की पहली फुहार इस बार मेरी पीढ़ी के लोगों के लिए सबसे अलग है। पिछले चार दशकों में मुझे ध्यान नहीं आता कि, जगन्नाथ रथयात्रा में लू के थपेड़े पड़े हों। ग्रामीण परिवेश में रथयात्रा के दिन बारिश की विशेष उम्मीद किसानों को होती है। लेकिन इस बार आषाढ़ में लू चलने से पानी के प्रति या बरसात को लेकर लोगों में जो कौतुकता थी, वह इस बार अन्य खबरों में दब गई। दूसरी ओर मौसम विभाग ने जो विशेषज्ञता हासिल की है वह भी काम आता नहीं दिखा। प्रदेश में मानसून सक्रिय होने वाला है, यह बात मौसम विभाग नहीं बता पाया। बल्कि उल्टे हीट वेव की चेतावनी जारी हो रही थी। वर्षों से मौसम विभाग की रिपोर्टिंग करने के दौरान जो कमियां नजर आती थी वह कमोबेस बनी हुई है। मानसून हर प्राणियों के लिए पहली प्राथमिकता है। खबर में बारिश का उत्सव इस तरह से हो कि तन और मन सब कुछ हरा हो जाए।
सत्ता और संगठन हुआ बेताला
प्रदेश के सत्तारूढ़ पार्टी में अंतर्द्वंद सामने आया है उसे सभी कॉलमिस्टों ने अपने कॉलम में जगह दी है। प्रदेश प्रभारी और अध्यक्ष के बीच नियुक्ति और इसके निरस्तीकरण आदेश से प्याज के कई छिलके निकल गए हैं। इसका डैमेज कंट्रोल किस तरह से होता है, यह देखने वाली बात है। लेकिन चुनाव से पहले सत्ता और संगठन बेताला हो जाए तो इसका स्वरूप आगे क्या होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। खासकर ऐसे समय में आप पार्टी की गिद्ध दृष्टि प्रदेश में जमी हो। 2018 में पीएल पुनिया ने जो संगठन में समन्वय लाया था वह सैलजा के लिए दोहराना सामान्य नहीं है।दरअसल, कांग्रेस में जब से झोलाछाप एनजीओ बिरादरी की पैठ बढ़ी है तब से पार्टी के अंदर एक महीन रेखा खींच गई है। यह महीन रेखा कितनी गहरी है यह तो समय बतायेगा। लेकिन छत्तीसगढ़ वह राज्य है जहां से कांग्रेस सरकार दोबारा वापसी कर सकती है और कांग्रेस की प्रासंगिकता को लेकर जो प्रश्न खड़े होते रहे हैं, उन्हें भी जवाब मिलेगा। दूसरे अर्थों में कहें तो छत्तीसगढ़ कांग्रेस के लिए प्रयोगशाला है। यहां से कांग्रेस तप कर निकलेगी तो इसकी चमक दूर तक जाएगी। लेकिन क्या नेहरुवियन यह स्वीकार कर पाएंगे।
आप पार्टी में नहीं लौटी रंगत
इस सप्ताह के आखिर में आप पार्टी बड़ी रैली न्यायधानी में कर रही है। अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान इस रैली में शामिल होंगे। इस विषय पर राजधानी के कॉलमिस्ट चुप हैं। क्योंकि बात भी कुछ खास नहीं है। पहले माना जा रहा था कि, आप पार्टी अप्रैल से सक्रिय हो जाएगी। लेकिन वह हुआ नहीं। आप पार्टी के थिंकटैंक व राज्य सभा सदस्य संदीप पाठक बिलासपुर जिले से ताल्लुक रखते हैं। जैसा कि माना जा रहा था कि संदीप पाठक को चेहरा मानकर छत्तीसगढ़ में आप पार्टी अपना विस्तार करेगी। लेकिन यह संभव नहीं हो पाया है। पार्टी के अंदर भी कोई मैसेज नहीं है। ताकी टिकट के दावेदार सक्रियता से काम करते। कुल मिलाकर अरपा-पैरी के धार देखो वाली बात है।
क्या भाजपा किसानों के लिए कर सकती है बड़ा फैसला
भाजपा संगठन हौले-हौले आगे बढ़ रहा है। आने वाले दिनों में क्या होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। दो दशकों से ग्रामीण व राजधानी-न्यायधानी में पत्रकारिता के बाद अपनी एक अलग ही समझ विकसित हुई है। अपन नजदीक से देख रहे हैं तो यह मन में ध्यान आता है कि, कुछ तो भाजपा के अंदर पक रहा है। वर्ना धान के समर्थन मूल्य को लेकर जिस अंदाज में बड़े नेता जवाब दे रहे हैं उनमें यों ही आत्मविश्वास नहीं झलक रहा, यह बात गौर करने वाली है। पता चला है कि पार्टी नेतृत्व इस बारे में विचार कर रहा है कि, धान के समर्थन मूल्य को लेकर घोषणा पत्र में भूपेश सरकार को बड़ा जवाब दे। जैसा कि भूपेश सरकार ने आने वाले दिनों में धान का समर्थन मूल्य 28 सौ करने की बात कह दी है।यह भाजपा के लिेए बड़ी चुनौती है। दरअसल, अगर भाजपा धान के समर्थन मूल्य 28 सौ या उससे अधिक देने की बात करती है, तो इसका असर दूसरे प्रदेशों में भी होगा और वहां भी इस तरह की घोषणा करनी होगी। लेकिन पार्टी संगठन छत्तीसगढ़ के मामले को सामान्य में नहीं ले सकता है। कांग्रेस सरकार रिपीट होना भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव के पहले सामान्य झटका नहीं होगा। ऐसे में धान का समर्थन मूल्य हो या किसानों के लिए कोई नया सौगात, घोषणा पत्र एक तरह से सरप्राइज की तरह हो तो बड़ी बात नहीं होगी।

राजधानी के कॉलमिस्ट इस बार कांग्रेस संगठन में बदलाव को लेकर अपनी-अपनी बात रखी है। अमित शाह की रैली में रमन सिंह व अरुण साव को
मिले तवज्जो पर भी बात कही गई है। जो कि एक घटनाक्रम है। इसके अलावा ब्यूरोक्रेट्स की खबरों को कॉलम में अधिक स्थान मिले हैं।
अमित शाह पहुंचे बारले के घर
अमित शाह अपने दुर्ग रैली में पंडवानी गायिका उषा बारले के घर पहुंचे। इस खबर को राजपथ-जनपथ ने जगह दी है जिसे आप तक पहुंचा रहा हूं। पिछले चुनाव में भाजपा को एससी रिजर्व विधा क्षेत्रों में केवल दो सीटों पर सफलता मिली है, मस्तुरी व मुंगेली में। यह सबसे बड़ा झटका भाजपा के लिए था, क्यूंकि इससे पहले 10 में से 9 सीटों पर भाजपा का कब्जा था। उषा बारले के घर पहुंचकर अमित शाह ने सतनामी समाज को सौहार्द का संदेश दिया है। लेकिन इससे पहले भी कार्यकर्ताओं के बीच बैठक में जाने वाले भाजपा के प्रदेश नेता सतनामी समाज को जोड़ने विशेष प्रयास में जुटे हैं। बसपा के कमजोर होने के बाद सतनामी समाज को लुभाने का यह प्रयास कितना कारगर साबित होगा मुझे समझ नहीं आता। क्यूंकि पहले इन रिजर्व सीटों पर भाजपा की जीत ध्रुवीकरण या फिर त्रिकोणीय मुकाबले में होती रही है। जहां तक मेरी समझ है, सतनामी समाज बसपा के बाद अगर किसी को वोट करेगा तो वह कांग्रेस पार्टी है। इस बदलाव काल को भाजपा अपने पक्ष में कितना कर पाती है, यह देखने वाली बात होगी।

सवाल- आपातकाल और मोदी की इंदिरा गांधी पर चुप्पी
25 जून 1975 को आपातकाल लगाया गया था। इस दिन भाजपा लोकतंत्र बचाने को लेकर विशेष कार्यक्रम करती रही है। लेकिन देर रात कॉलम लिखते मुझे एक आईपीएस की बात दिमाग में आई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस व गांधी परिवार के खिलाफ बोलने में कोई कसर छोड़ते होंगे, ऐसा शायद ही किसी को लगेगा। लेकिन वे (नरेन्द्र मोदी) आज तक इंदिरा गांधी का नाम लेकर कौन सी निंदा की, क्या यह कोई बता सकता है?

Share

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *