..अखिल पांडे
बिलासपुर
19/06/2023
कॉलम लिखने की हसरत अपनी पत्रकारिता करियर के शुरुआत से ही थी। लेकिन प्रिंट मीडिया में शुरु के पांच-छः साल बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने की वजह से यह इच्छा पूरी नहीं हुई। अच्छा, आपको जानकर यह हैरत होगी कि, कॉलम लिखने के जब सपने देखता था तब यह नाम सोच चुका था कि, मैं गोंदली के फोकला यानी प्याज के छिलके नाम से कॉलम लिखूंगा। सो आज कॉलम लिखने की शुरुआत कर रहा हूं। हालांकि मेरी कॉलम अन्य कॉलम के सार होंगे। यानी मेरी मौलिक खबर कम होगी। दरअसल, प्रदेश के नामचीन पत्रकार काफी मेहनत के साथ अपनी कॉलम जारी करते हैं। ऐसे में राजधानी से दूर रहकर पॉलिटिकल कॉलम लिखना मुनासिब नहीं होगा। लेकिन आम पाठक सभी पत्रकारों के कॉलम नहीं पढ़ पाते। इसलिए इस एक कॉलम से सभी कॉलमिस्ट की प्रमुख खबरें आप तक पहुंचाने की कोशिश करुंगा।
कॉलम भी दो तरह के होते हैं। पहला केवल इशारों-इशारों में बात रखने वाली खबर होती है। जिसका कोई अर्थ मुझे नजर नहीं आता। क्योंकि ऐसी खबरें आम जनता के समझ से परे है। तो इस तरह के कॉलम की खबरों से हमें कोई लेना-देना नहीं है। हां कुछ प्रदेश के दमदार पत्रकार हैं। जिनके कॉलम हमें पढ़ने को नहीं मिल पाते। उनकी खबरें मैं रोज सप्ताह के पहले दिन देने की कोशिश करुंगा।
गोंदली के फोकला
ज्योतिष,तंत्र-मंत्र और पीआर एजेंसी की बाढ़
बातों ही बातों में कुछ बात ऐसी निकल जाती है जो चेहरे से नकाब की तहें निकालने वाली होती है। भले ही नकाब निकालने पर फिर नकाब नजर आता है चेहरा दिखने की गारंटी नही होती। हुआ भी कुछ इसी तरह से। गोंदली के फोकला एक-एक कर निकालने की शुरुआत करें तो बात बिलासपुर के छत्तीसगढ़ भवन की है। कई सहाफियों के बीच पूर्व कद्दावर मंत्री ने गोंदली का फोकला उघाड़ते हुए बताया कि, औसतन रोज ज्योतिषाचार्य, तंत्र-मंत्र वाले बाबा या फिर पीआर एजेंसी वालों का फोन उनके पीए पास आते रहता है। जाहिर है, चुनाव नजदीक होने पर इस तरह के लोगों का बाजार गर्माने लगा है। राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले हों या फिर राजनीतिक रसूख वाले लोग, उनके पास जनसंपर्क के नये तरीके या फिर यों कहें कि सोशल मीडिया में पहुंच बढ़ाने की जिम्मेदारी लेने वाले पीआर एजेंसी, इन दिनों अपनी क्लाइंट की लिस्ट बढ़ाने में लगे हैं। क्योंकि पीआर एजेंसी की भरमार हो चुकी है। ज्योतिषाचार्य व तंत्र-मंत्र का बोलबाला हमेशा से राजनीतिक गलियारों में रहा है। यह समय परा विद्या का लोहा मनवाने का है तो बाबा भला क्यूं पीछे रहेंगे। लेकिन मजे की बात है कि पीआर एजेंसी या बाबाओं की फीस लाखों में है। परिणामस्वरूप वर्षों से राजनीति में रच-बसे हैं वे भला क्यों फंसेंगे। हां, नये महत्वाकांक्षी राजनीतिज्ञों का क्या हाल होगा इसका अंदाजा लगा सकते हैं।
धर्मजीत ने पूर्व मुख्यमंत्री का किया स्वैग से स्वागत
पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह रविवार को बिलासपुर प्रवास पर आए। छत्तीसगढ़ भवन में स्वागत करने वालों में जनता कांग्रेस के विधायक धर्मजीत सिंह दिखाई दिए। स्वागत भी भावपूर्ण हुआ। गुलदस्ता लेते हुए रमन सिंह की मुस्कान यह चुगली कर रही थी कि, धर्मजीत के लिए वे उत्साहित हैं। राजनीतिक गलियारों में यह बात तैर रही है कि, धर्मजीत सिंह लोरमी के बजाय इस बार तखतपुर विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहते हैं। पर धर्मजीत की ख्वाहिश भाजपा में कितनी पूरी हो पाती है यह तो आने वाला समय बतायेगा। एक बात जरूर मालूम हो कि, धर्मजीत सिंह पूर्व मुख्यमंत्री के गृह जिला के निवासी हैं। पहले लोरमी-पंडरिया विधानसभा सीट होती थी। जहां से वे चुनाव जीतकर धरमजीत पहले विधायक बने थे। डि-लिमिटेशन के बाद पंडरिया व लोरमी दोनों विधानसभा सीट अस्तित्व में आ गया। हालांकि धर्मजीत पंडरिया निवासी हैं और कवर्धा जिले में आज भी सक्रिय रहते हैं। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि डॉ साब और धर्मजीत सिंह की निकटता आज की नहीं है।
आदिपुरुष बैन मामला भूपेश के पाले में
पैन इंडिया सुपर स्टार प्रभास की फिल्म आदिपुरुष इन दिनों विवादों में घिरा है। इस मामले में डॉ रमन सिंह से सवाल पूछे जाने पर उन्होंने गेंद मुख्यमंत्री के पाले में डाल दिया। जैसा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक दिन पहले ही कहा था कि, अगर इस फिल्म को बैन करने की मांग होगी तो वे जरूर फैसला लेंगे। इस पर रमन सिंह ने साफ कहा कि, फिल्म पर कुछ बोलने के बजाय बैन किया जाना चाहिए, इधर- उधर की बात करना बेमानी है। आदिपुरुष को नेपाल में बैन कर दिया गया है। अब भारत के कई राज्यों में बैन करने की मांग उठ रही है। फिल्म के घटिया डायलॉग के कारण रामायण की गरिमा ठेस पहुंचाने की बात हो रही है।परिणास्वरुप फिल्म को बैन करने की मांग उठ रही है। छत्तीसगढ़ में राम अपने आप में राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। ऐसे में छत्तीसगढ़ में भी इस फिल्म को लेकर जल्द फैसले की उम्मीद की जा रही है।
राजधानी के कॉलमिस्ट
स्वास्थ्य है नया राजनीतिक हथकंडा
तिरछी नजर कॉलम में बताया गया है कि टिकट के दावेदारों के स्वास्थ्य को लेकर विरोधी पक्ष जानकारी जुटाने में लगे हैं। नया राज्य बने 23 साल हो गये, लेकिन प्रथम पीढ़ी के राजनीतिज्ञों का बोलबाला अब तक जारी है। टिकट पाने वाले प्रतिद्वंदी एक दूसरे के स्वास्थ्य पर तिरछी नजर रखे हुए हैं। क्योंकि राजनीति में सक्रियता पहली मांग हो चुकी है। लेकिन स्वास्थ्य के बिना यह सक्रियता संभव नहीं है। इस चक्कर में टिकट में डंडी मारने वालों ने हेल्थ डायग्नोस करना शुरू कर दिया है। यह भी नया राजनीतिक हथकंडा है। आने वाले दिनों में टिकट के दावेदारों के लिए स्वास्थ्य का मामला मुश्किल पेश करेगा। अब धर्मजीत सिंह और रेणु जोगी के स्वास्थ्य पर इसी तरह के सवाल हैं। जबकि कालम में यह जानकारी दी गई है कि, दो भाजपा नेताओं की स्वास्थ्य के कारण टिकट कटने जा रही है।
भाजपा में आगे का रोड मैप
तरकश कॉलम में यह जानकारी दी गई है कि, भाजपा में सब कुछ ठंडा पड़ा हुआ है। जबकि 2003 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए जिस तरह से आक्रामकता पार्टी में दिखाई देती थी वह नहीं दिख रही है। कर्नाटक चुनाव के बाद छत्तीसगढ़ में भाजपा की सक्रियता बढ़ने की उम्मीद की जा रही थी।लेकिन अब तक रोड मैप साफ नजर नहीं आ रहा है। आने वाले कुछ दिनों में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, अमित शाह, राजनाथ सिंह के दौरे राज्य में होने हैं। इसकी तैयारियां चल रही है। लेकिन भूपेश बघेल की नीतियों के खिलाफ बोलने या मुद्दा उठाने के लिए स्थानीय नेताओं को मजबूत करते भाजपा संगठन नजर नहीं आ रहा है। कॉलम में बताया गया है कि पार्टी के अंदर नेता केन्द्रीय नेतृत्व से चमत्कार की उम्मीद लगाए हुए हैं।
बैस के बेस पर भरोसा
राज्य के बड़े नेता और महाराष्ट्र के राज्यपाल रमेश बैस को लेकर लगातार राजधानी में बात होती है। कारवां कॉलम में पहले भी यह बात उठी थी। बैस जी जब त्रिपुरा के राज्यपाल थे तब भी उनकी छत्तीसगढ़ की राजनीति में वापसी बात की जाती थी। लेकिन उनका प्रमोशन महाराष्ट्र हो गया। अब वे जब भी राज्य के प्रवास पर आते हैं तो यह चर्चा आम हो जाती है कि क्या केन्द्रीय नेतृत्व रमेश बैस के नेतृत्व में अगला चुनाव लड़ना चाहेंगे। इस बात में कितना दम है यह तो कोई नहीं जानता। साथ ही केन्द्रीय नेतृत्व क्या चाहता है और कब क्या फैसला लेगा यह भी अंदाजा लगाना मुश्किल है। आने वाले दिनों में केन्द्रीय नेतृत्व प्रदेश के दौरे में आएंगे। यह केवल नेताओं व कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह बनाने के लिए होगा। लेकिन किसे टिकट मिलेगा किसके नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा, इस मामले में गोंदली के फोकला निकालने की स्थिति किसी की नहीं। फिलहाल भाजपा में बैठकों के अलावा कुछ नहीं हो रहा है। ऊपर से निर्देश आता है और स्वस्फूर्त उस निर्देश का परिपालन किया जाता है।
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